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रमेशकुमार सिंह चौहान के छत्तीसगढ़ी काव्यांजली:- सुरता rkdevendra.blogspot.com

जनउला-दोहा

चित्र गुगल से साभार

जनउला
1.
हाड़ा गोड़ा हे नही, अँगुरी बिन हे बाँह ।
पोटारय ओ देह ला, जानव संगी काँह ।।

2.
कउवा कस करिया हवय, ढेरा आटे डोर ।
फुदक-फुदक के पीठ मा, खेलय कोरे कोर ।।

3.
पैरा पिकरी रूप के, कई कई हे रंग ।
गरमी अउ बरसात मा, रहिथे मनखे संग ।।

4.
चारा चरय न खाय कुछु, पीथे भर ओ चॅूस ।
करिया झाड़ी मा रहय, कोरी खइखा ठूॅस ।।

5.
संग म रहिथे रात दिन, जिनगी बनके तोर ।
दिखय न आँखी कोखरो, तब ले ओखर सोर ।।

6.
हाथ उठा के कान धर, लहक-लहक के बोल ।
मया खड़े परदेश मा, बोले अंतस खोल ।।

7.
बिन मुँह के ओ बोलथे, दुनियाभर के गोठ ।
रोज बिहनिया सज सवँर, घर-घर आथे पोठ ।।

8.
मैं लकड़ी  कस डांड अंव, खड़-खड़ मोरे पेट ।
रांधे साग चिचोर ले, देके मोला रेट ।।

9.
खीर बना या चाय रे, मोर बिना बेकार ।
तोरे मुँह के स्वाद अंव, मोरे नाव बिचार ।।


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उत्तर
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1 टिप्पणियाँ:

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Unknown
admin
18 नवंबर 2019 को 4:23 am ×

Jai Chhattisgarh

Congrats bro Unknown you got PERTAMAX...! hehehehe...
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