शनिवार, 26 जनवरी 2019

मया बिना ये जिनगी कइसे

मया बिना ये जिनगी कइसे होथे, हवा बिना जइसे देह काया ।
रंग मया के एक कहां हे संगी, इंद्रधनुष जइसे होय माया ।।
मया ददा-दाई के पहिली जाने, भाई-बहिनी घला पहिचाने ।
संगी मेरा तैं हर करे मितानी, तभो एकझन ला अपन जाने ।।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

बुधवार, 23 जनवरी 2019

टोकब न भाये

टोकब न भाये
(करखा दंडक छंद)

काला कहिबे, का अउ कइसे कहिबे, आघू आके, चिन्हउ कहाये ।
येही डर मा, आँखी-कान ल मूंदे, लोगन कहिथे, टोकब न भाये ।।
भले खपत हे, मनखे चारों कोती, बेजा कब्जा, मनभर सकेले ।
नियम-धियम ला, अपने खुद के इज्जत, धरम-करम ला, घुरवा धकेले ।।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

मंगलवार, 22 जनवरी 2019

कर मान बने धरती के

कर मान बने धरती के
(खरारी छंद)

कर मान बने, धरती के, देश प्रेम ला, निज धर्म बनाये ।
रख मान बने, धरती के, जइसे खुद ला, सम्मान सुहाये ।।
उपहास करे, काबर तैं, अपन देश के, पहिचान भुलाये ।
जब मान मरे, मनखे के, जिंदा रहिके, वो लाश कहाये ।।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

सबो चीज के अपने गुण-धर्म

सबो चीज के अपने गुण धर्म, एक पहिचान ओखरे होथे ।
कोनो पातर कोनो रोठ, पोठ कोनो हा गुजगुज होथे ।
कोनो सिठ्ठा कोनो मीठ, करू कानो हा चुरपुर होथे ।
धरम-करम के येही मर्म, धर्म अपने तो अपने होथे ।।

सबो चीज के अपने गुण दोश, दोष भर कोनो काबर देखे ।
गुण दूसर के तैंहर देख, दोष ला अपने रखत समेखे ।।
मनखे के मनखेपन धर्म, सबो मनखे ला एके जाने ।
जीव दया ला अंतस राख, सबो प्राणी ला एके माने ।।
-रमेशकुमार सिंह चौहान

बुधवार, 16 जनवरी 2019

करम बडे जग मा

करम बडे जग मा
(दुर्मिल छंद)

करम बड़े जग मा, हर पग-पग मा, अपन करम गति ला पाबे ।
कोने का करही, पेटे भरही, जभे हाथ धर के खाबे ।।
काबर तैं बइठे, अइठे-अइठे, काम-बुता सब ला चाही ।
फोकट मा मांगे, जांगर टांगे, ता कोने हम ला भाही ।।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

खेत-खार म जहर-महुरा

खेत-खार म जहर-महुरा
(दंडकला छंद)

कतका तैं डारे, बिना बिचारे, खेत-खार म जहर-महुरा ।
अपने मा खोये, तैं हर बोये, धान-पान य चना-तिवरा ।।
मरत हवय निशदिन, चिरई-चिरगुन, रोगे-राई मा मनखे ।
मनखे सब जानय, तभो न मानय, महुरा ला डारय तनके ।।
-रमेशकुमार सिंह चौहान

सोमवार, 14 जनवरी 2019

बर-पीपर के तुमा-कोहड़ा

बर-पीपर के तुमा-कोहड़ा
(समान सवैया छंद)

बर-पीपर के ओ रूख राई, धीरे-धरे तो बाढ़त जावय ।
बाढ़त-बाढ़त ठाड़ खड़ा हो, कई बरस ले तब इतरावय ।।
तुमा-कोहड़ा नार-बियारे, देखत-देखत गहुदत  जावय ।
चारे महिना बड़ इतराये, खुद-बा-खुद ओ फेर सुखावय ।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

अंगाकर रोटी

अंगाकर रोटी कड़क, सबला गजब मिठाय ।
घी-शक्कर के संग मा, सबला घात सुहाय ।।
सबला घात सुहाय, ससनभर के सब खाथे ।
चटनी कूर अथान, संग मा घला सुहाथे ।।
तहुँहर खाव ‘रमेश’, छोड़ के सब मसमोटी ।
जांगर करथे काम, खात अंगाकर रोटी ।।

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बुधवार, 9 जनवरी 2019

सुन रे भोला

बनव-बनव मनखे, सबझन तनके, माटी कस सनके, बाँह धरे ।
खुद ला पहिचानव, खुद ला मानव, खुद ला सानव, एक करे ।।
ईश्वर के जाये, ये तन पाये, तभो भुलाये, फेर परे ।
तैं अलग मानथस, खुद ल जानथस, घात तानथस, अलग खड़े ।।

आघू पढ़व

रविवार, 6 जनवरी 2019

बेजाकब्जा

बेजाकब्जा हा हवय, बड़े समस्या यार ।
येहू एक प्रकार के, आवय भ्रष्चाचार ।।
आवय भ्रष्टाचार,  जगह सरकारी घेरब ।
हाट बाट अउ खार,  दुवारी मा आँखी फेरब ।।
सुनलव कहय रमेश, सोच के ढिल्ला कब्जा ।
जेलव देखव तेन, करत हे बेजा कब्जा ।।

चारों कोती देश मा, हवय समस्या झार ।
सबो समस्या ले बड़े, बेजाकब्जा यार ।।
बेजाकब्जा यार,  झाड़-रुख ला सब काटे ।
नदिया तरिया छेक, धार पानी के पाटे ।।
पर्यावरण बेहाल, ढाँक मुँह करिया धोती ।
साकुर-साकुर देख, गली हे चारों कोती ।

-रमेश चौहान
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