गुरुवार, 16 मई 2019

छोड़ दारु के फेशन

छोड़ दारु के फेशन, हे बड़ नुकसान ।
फेशन के चक्कर मा, हस तैं अनजान ।।

नशा नाश के जड़ हे, तन मन ला खाय ।
कोन नई जानय ये, हे सब भरमाय ।।

दारु नशा ले जादा, फेशन हे आज ।
पढ़े-लिखे अनपढ़ बन, करथे ये काज।।

कोन धनी अउ निर्धन, सब एके हाल ।
मनखे-मनखे चलथे, दरुहा के चाल ।।

नीत-रीत देखे मा, दोषी सरकार ।
चाल-चलन मनखे के, रखय न दरकार ।।

-रमेश चौहान

देवनागरी मा लिखव

जनम भूमि अउ जननी, सरग जइसे ।
जननी भाखा-बोली, नरक कइसे ।।

छत्तीसगढ़ी हिन्दी, लाज मरथे ।
जब अंग्रेजी भाखा, मुड़ी चढ़थे ।।

देवनागरी लिपि के, मान कर लौ ।
तज के रोमन झांसा, मया भर लौ ।।

कबतक सहत गुलामी, हमन रहिबो ।
कबतक दूसर भाखा, हमन कहिबो ।।

देवनागरी मा लिख, हिम्मत करे ।
कठिन कहत रे येला, दिल नइ जरे ।।

दुनिया देवय झासा, कठिन कहिके ।
तहूँ मगन हस येमा, मुड़ी सहिके ।।

-रमेश चौहान

बुधवार, 15 मई 2019

छत्तीसगढ़ी बरवै

छत्तीसगढ़ी बरवै

छत्तीसगढ़ी अड़बड़, गुरतुर बोल ।
बोलव संगी जुरमिल, अंतस खोल ।।

कहाँ आन ले कमतर, हवय मितान ।।
अपने बोली-बतरस, हम गठियान ।।

छोड़ चोचला अब तो, बन हुशियार ।
अपन गोठ हा अपने, हे कुशियार ।।

पर के हा पर के हे, अपन न मान ।
अपने भाखा पढ़-लिख, हम गुठियान ।।

अंग्रेजी मा फस के, हवस गुलाम ।
अपने भाखा बोलत, करलव काम ।।

बासी खाके दाई, काम-बुता मा जाहूँ

दे ना दाई मोला, दे ना दाई मोला, एक सइकमा बासी, अउ अथान चटनी ।
संग गोंदली दे दे, दे दे लाले मिरचा, रांधे हस का दाई, खेड़हा -खोटनी ।।
बासी खाके दाई, काम-बुता मा जाहूँ, जांगर टोर कमाके, दू पइसा लाहूँ ।
दू-दू पइसा सकेल, सिरतुन मा ओ दाई, ये छितका कुरिया ला, मैं महल बनाहूँ ।।

-रमेश चौहान

मंगलवार, 14 मई 2019

चल खेल हम खेलबो

चल चली खोर मा, बिहनिया भोर मा, गाँव के छोर मा, खेल हम खेलबो ।
मुबाइल छोड़ के, मन ला मरोड़ के, सबो ला जोड़ के, संग मा ढेलबो ।।
चार झन संग मा, पचरंग रंग मा, खेल के ढंग मा, डंडा ल पेलबो ।
छू छू-छुवाल के, ओखरे चाल के, मन अपन पाल के, दाँव ला झेलबो ।।
-रमेश चौहान

सोमवार, 13 मई 2019

अपन बोली मा बोलव

//अपन बोली मा बोलव//
(शुभग दंडक छंद)

 मन अपन तैं खोल, कुछु फेर बोल, कुछु रहय झन पोल, निक लगय गा गोठ ।
खुद अपन ला भाख, खुद लाज ला राख, सब डहर ला ताक, सब करय गा पोठ ।
गढ अपन के बात, जस अपन बर भात, भर पेट सब खात, कर तुहूँ गा रोठ ।
गढ़ हमर छत्तीस, तब बोल मत बीस, मन डार मत टीस, अब बनव गा मोठ ।।

-रमेश चौहान

रविवार, 12 मई 2019

प्रभु तोर सिखावन, हम सब अपनावन

//उद्धत दंडक//
जय राम रमा पति, कर विमल हमर मति, प्रभु बन जावय गति, जगत कर्म प्रधान ।
सतकर्म करी हम, जब तलक रहय दम, अइसन दौ दम-खम, जगत पति भगवान ।।
जग के तैं पालक, भगतन उद्धारक, कण-कण के कारक, धरम-करम सुजान ।
प्रभु तोर सिखावन, हम सब अपनावन, मन ला कर पावन, अपन चरित बनान ।।
-रमेश चौहान