सोमवार, 22 जुलाई 2019

सावन

सावन तैं करिया बिलवा हस,
तैं छलिया जस कृष्ण मुरारी ।
जोहत-जोहत रोवत हावँव,
आत नई हस  मोर दुवारी ।।
बूँद कहां तरिया नरवा कुछु
बोर कुवाँ नल हे दुखियारी ।
बावत धान जरे धनहा अब
रोय किसान धरे मुड़ भारी ।।

पीयब धोब-नहावब के अब
संकट ले बड़ संकट भारी ।
बोर अटावत खेत सुखावत
ले कइसे अब जी बनवारी ।
आवव-आवव बादर सावन
संकट जीवन मा बड़ भारी ।।
देर कहूँ अब तैं करबे तब।
जीयत बाचब ना जग झारी ।।

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