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कतका झन देखे हें-

मोरे मन के पीर

देखत तो रहिगेंव मैं, वो सपना दिन रात ।
गोठियावंव का अपन, सपना के वो बात ।।
सपना के ओ बात, गीत मोरे कब बनगे ।
मोरे मन के पीर, गीत मा कइसे ढल गे ।।
गोहरात रहिगेंव, आंसु आंखी के पोछत ।
अक्केल्ला मत छोड़, तभो गय मोला देखत ।।

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