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कतका झन देखे हें-

ये जीनगी के काहीं धरे कहां हे

अभी मन हा
भरे कहां हे
ये जीनगी के
काहीं धरे कहां हे

चाउर दार निमेर के
पानी कांजी भरे हे
घर के मोहाटी मा
दीया बाती धरे हे
अभी चूल्हा मा
आगी बरे कहां हे

करिया करिया
बादर हा छाये हे
रूख-राई हा
डारा-पाना ल डोलाये हे
पानी के बूँद हा अभी
धरती मा परे कहां हे

काल-बेल के
घंटी घनघनावत हे
हड़िया के अंधना
सनसनावत हे
जोहत हे भीतरहिन
अभी पैना भरे कहां हे

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