विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
2 हफ़्ते पहले
(कुण्डलियां)
चुन्दी बगरे हे मुड़ी, जस कोनो फड़बाज।
लम्बा-लम्बा ठाढ़ हे, जइसे के लठबाज ।।
जइसे के लठबाज, तने हे ठाढ़े-ठाढ़े ।
कंघी के का काम, सरत हे माढ़े-माढ़े ।।
मुसवा दे हे चान, खालहे ला जस बुन्दी ।
आज काल के बात, मुड़ी मा बगरे चुन्दी ।।
-रमेश चौहान
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