मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

मन के परेवना

मन के परेवना
उड़ी-उड़ी के
दुनिया भर घूमत हे

ठोमहा भर मया होतीस
सुकुन के पेड़ जेन बोतीस
लहर लहर खुषी के लहरा
तन मन ला मोर भिगोतीस

आँखी मा सपना
देखी-देखी के
अपने तकिया चूमत हे

अरझे सूत ला खोलत-खोलत
अपने अपन मा बोलत-बोलत
जीनगी के फांदा मा फसे
चुरमुरावत हे डोलत-डोलत

अपने हाथ ला
चाब-चाब के
अपने आँखी ला घूरत हे