अरे दुख पीरा, तैं मोला का डेरूहाबे मैं पर्वत के पथरा जइसे, ठाढ़े रहिहूँव । हाले-डोले बिना, एक जगह माढ़े रहिहूँव जब तैं चारो कोती ले बडोरा बनके आबे अरे दुख पीरा, तैं मोला का ...
गुल्लक (हिंदी लघुकथा) – डॉ. विनोद कुमार वर्मा
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दस बरस की अंशु की छुट्टियाँ चल रही थी। आज शुक्रवार का दिन था।
महीने का आखिरी तारीख भी। पापा आफिस जाने के लिए निकल ही रहे थे कि…
4 दिन पहले