मंगलवार, 31 जुलाई 2018

लोकतंत्र के देवता

रोजी-रोटी के प्रश्न के, मिलय न एक जवाब ।
भिखमंगा तो जान के, मुफत बांटथे जनाब ।।

फोकट अउ ये छूट के, चलन करय सरकार ।
जेला देखव तेन हा, बोहावत हे लार ।

सिरतुन जेन गरीब हे, जानय ना कुछु एक ।
जेन बने धनवान हे, मजा करत हे नेक ।

काबर कोनो ना कहय, येला भ्रष्टाचार ।
जनता अउ सरकार के, लगथे एक विचार ।।

हर सरकारी योजना, मंडल के रखवार ।
चिंता कहां गरीब के, मरजय धारे धार ।

फोकट बांटे छोड़ के, केवल देवय काम ।
काम बुता हर हाथ मा, मनखे सुखी तमाम ।

लोकतंत्र के देवता, माने खुद ला आन ।
चढ़े चढ़ावा देख के,  बने रहय अनजान ।।

-रमेशचौहान

मंगलवार, 24 जुलाई 2018

छत्तीसगढ़ी ला पोठ बनाव

भाषा अपन बिगाड़ मत, देखा-शेखी आन कहाये ।
देवनागरी के सबो,  बावन अक्षर घात सुहाये ।।
छत्तीसगढ़ी  मा भरव,  सबो वर्ण ले शब्द बनाए ।
कदर बाढ़ही एखरे , तत्सम आखर घला चलाए ।।

पढ़े- लिखे अब सब हवय, उच्चारण ला पोठ बनाही।
दूसर भाषा संग तब, अपने भाषा हाथ मिलाही ।
करव मानकीकरण अब, कलमकार सब एक कहाये ।
पोठ करव लइका अपन, भाषा अपने पोठ धराये ।।

शनिवार, 21 जुलाई 2018

कभू आय कभू तो जाय


कभू आय कभू तो जाय, सुख बादर जेन कहाये।
सदा रहय नहीं गा साथ, दुख जतका घाम जनाये ।।
बने हवय इहां दिन रात, संघरा कहां टिक पाये ।
बड़े होय भले ओ रात, दिन पक्का फेर सुहाये ।।

कती खोजी

कती जाई कती पाई, खुशी के ओ ठिकाना ला ।
कती खोजी गँवाये ओ, हँसे के रे बहाना ला ।।
फिकर संसो जिये के अब, नदागे लइकुसी बेरा ।
बुता खोजी हँसी खोजी, चलय कइसे नवा डेरा ।।

सोमवार, 9 जुलाई 2018

ये गाँव ए

ये गाँव ए भल ठाँव ए,  इंसानियत पलथे जिहां।
हर राग मा अउ गीत मा, स्वर प्रेम के मिलथे इहां  ।।
हे आदमी बर आदमी, धर हाथ ला सब संग मा ।
मनखे जियत तो हे जिहां, मिलके धरा के रंग मा ।

संतोष के अउ धैर्य के, ये पाठशाला  आय गा ।
मन शांति के तन कांति के, रुखवा जिहां लहराय गा ।।
पइसा भले ना हाथ मा, जिनगी तभो धनवान हे ।
खेती किसानी के बुते, हर आदमी भगवान हे ।।

शनिवार, 7 जुलाई 2018

छोड़ शांति के खादी

घात प्रश्न तो आज खड़े हे, कोन देश ला जोरे ।
भार भरोसा जेखर होथे, ओही हमला टोरे ।।
नेता-नेता बैरी दिखथे, आगी जेन लगाथे ।
सेना के जे गलती देखे, आतंकी ला भाथे ।।

काला घिनहा-बने कहँव मैं, एके चट्टा-बट्टा ।
सत्ता धरके दिखे जोजवा, पाछू हट्टा-कट्टा ।।
देश पृथ्ककारी के येही, रक्षा काबर करथे ।
बैरी मन के देख-रेख मा, हमरे पइसा भरथे ।।

देश पृथ्ककारी हे जेने, ओला येही पोसे ।
दोष अपन तो देख सकय ना, दूसर भर ला कोसे ।।
थांघा आवय आतंकी मन, पेड़ अलगाववादी ।
जड़ ले काटव अइसन रूखवा, छोड़ शांति के खादी ।।

जतेक हे अलगाववादी

जतेक हे अलगाववादी, देश अउ कश्मीर मा ।
सबो ल पोषत कोन हे गा, सोच तो तैं धीर मा ।
हमार ले तो टेक्स लेके, पेट ओखर बोजथे ।
नकाम सब सरकार लगथे, जेन ओला तो पोषथे ।।

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

एक जग के सार येही


राम सीता राम सीता, राम सीता राम राम ।
श्याम राधा श्याम राधा, श्याम राधा श्याम श्याम ।।
नाम येही जाप कर ले, मोर मनुवा बात मान ।
एक जग के सार येही, नाम येही सार जान ।।
-रमेश चौहान

बुधवार, 4 जुलाई 2018

अंग्रेजी के जरूरत कतका

अंग्रेजी के जरूरत कतका, थोकिन करव विचार ।
भाषा चाही के माध्यम गा, का हे येखर सार ।।
मानत जानत हे दुनिया हा, अपने भाषा नेक ।
दूसर भाषा बाधा जइसे,  रद्दा राखे छेक ।।

हर विचार हा अपने भाषा, होथे बड़का पोठ ।
अपन सोच हा दूसर भाषा, लगथे अड़बड़ रोठ ।।
अपने भाषा के माध्यम मा, पढ़ई-लिखई  नेक ।
मूल सोच ला दूसर भाषा, राखे रहिथे छेक ।।

दुनिया के भाषा अंग्रेजी, आथे बहुथे काम ।
भाषा जइसे येला सीखव, पावव जग मा नाम ।।
अंग्रेजी माध्यम के चक्कर, हमला करे गुलाम ।
अपने भाषा अउ विचार मा, काबर कसे लगाम ।।

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

देखव शहर के गाँव मा

देखव शहर के गाँव मा, एके दिखे हे चाल ।।
परदेश कस तो देश हा, कइसे कहँव मैं हाल।।
अपने अपन मा हे मगन, बड़का खुदे ला मान ।
मतलब कहां हे आन ले, अपने अपन ला तान ।।

फेशन धरे हे आन के,  अपने चलन ला टार ।
अपने खुशी ला देखथे, परिवार ला तो मार ।।
दाई ददा बस पोसथे, लइका अपन सिरजाय ।
बड़का बढ़े जब बेटवा, दाई ददा बिसराय ।।

बिगडे़ नई हे कुछु अभी, अपने चलन धर हाथ ।
जुन्ना अपन संस्कार धर, परिवार के धर साथ ।।
भर दे खुशी ला आन के, पाबे खुशी तैं लाख ।
एही हमर संस्कार हे, एही हमर हे साख ।।
-रमेश चौहान

रविवार, 1 जुलाई 2018

दारु भठ्ठी बंद कर दे


गाँव होवय के शहर मा, एक सबके चाल हे ।।
रोज दरूहा के गदर मा, आदमी बेहाल हे ।।
हे मचे झगरा लड़ाई, गाँव घर परिवार मा ।।
रोज के परिवार टूटय, दारू के ये मार मा ।।

रात दिन सब एक हावे,, देख दरूहा हर गली ।
हे बतंगड़ हर गली मा, कोन रद्दा हम चली ।
जुर्म दुर्घटना घटे हे, आज जतका गाँव मा ।
देख आँखी खोल के तैं, होय दरूहा दाँव मा ।।

सोच ले सरकार अब तैं, दारू के ये काम हे ।
आदमी बेहाल जेमा, दाग तोरे नाम हे ।।
दारू भठ्ठी बंद कर दे, टेक्स अंते जोड़ दे ।
पाप के हे ये कमाई,  ये कमाई छोड़ दे ।

आदमी के सरकार तैं हा, आदमी खुद मान ले ।
आदमी ला आदमी रख, आदमी ला जान ले ।।
काम अइसे तोर होवय, आदमी बर आदमी ।
आदमी के कर भलाई, हस तभे तैं आदमी ।।

-रमेश चौहान