जांगर टोर-जेन हा, खून पसीना बहाये, ओही मनखे के संगी, नाम मजदूर हे । रिरि-रिरि दर-दर, दू पइसा पाये बर ओ भटका खायेबर, आज मजबूर हे । अपन गाँव गली छोड़, अपने ले मुँह मोड़ जाके परदेश बसे, अपने ले दूर हे । सुख-दुख मा लहुटे, फेर शहर पहुटे हमर बनिहार के, एहिच दस्तूर हे ।। कोरोना माहामारी के, मार पेट मा सहिके का करय बिचारा, गाँव कोती आय हे । करे बर बुता नहीं, खाये बर कुछु नहीं डेरा-डंडी छोड़-छाड, दरद देखाय हे । नेता हल्ला-गुल्ला कर, अपने रोटी सेकय दूसर के पीरा मा, राजनीति भाय हे । येखर-वोखर पाला, सरकार गेंद फेकत अपने पूछी ल संगी, खुदे सहराय हे । -रमेश चौहान
कहानी: लंगड़ा कौन? (आपबीती)- डॉ. विनोद कुमार वर्मा
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( 1 ) एक लंगड़ा भिखारी बैसाखी पकड़े हाथ फैलाए खड़ा था। ‘दू रुपिया बाबूजी
….. दू रुपिया …..’ मुझे प्लेटफॉर्म पर पहुँचने की थोड़ी जल्दी थी। ट्रेन आने
का…
1 दिन पहले