सस्ता मा समान बेच, लालच देखावत हे, हम बिसावत हन के, हमला बिसावत हे । धरे हन मोबाइल, चाइना हम हाथ मा, ओही मोबाइल बीच, चीन डेरूवावत हे । बात-बात मा चाइना, हर काम मा चाइना सस्ता के ये चक्कर ह, चक्कर बनावत हे । सस्ता के ये चक्कर म, अपनेे ला झन बेच अपनो ल देख संगी, तोला ओ बिगाड़त हे ।
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
2 दिन पहले