छत्तीसगढ़ी भाषा अउ छत्तीसगढ़ के धरोहर ल समर्पित रमेशकुमार सिंह चौहान के छत्तीसगढ़ी छंद कविता के कोठी ( rkdevendra.blogspot.com) छत्तीसगढ़ी म छंद विधा ल प्रोत्साहित करे बर बनाए गए हे । इहॉं आप मात्रिक छंद दोहा, चौपाई आदि और वार्णिक छंद के संगेसंग गजल, तुकांत अउ अतुकांत कविता पढ़ सकत हंव ।
मया के रंग ऊँकर पदचाप जलतरंग । रमेश भाई, आप बढिया लिखे हव,फेर एकरो ले सुघ्घर लिख सकत हव । "बृज अवधी सरिख छत्तीसगढी बन जातिस सूर तुलसी सरिख साहित्य हमला रचना हे। मैथिली ल विद्यापति जइसे अमर बना दिहिस वोही ढंग के भगीरथ प्रयास हमला करना हे ।"
चौपाई छंद अटकन बटकन दही चटाका । झर झर पानी गिरे रचाका लउहा-लाटा बन के कांटा । चिखला हा गरीब के बांटा तुहुुर-तुहुर पानी हा आवय । हमर छानही चूहत जावय सावन म करेला हा पाके । करू करू काबर दुनिया लागे चल चल बेटी गंगा जाबो । जिहां छूटकारा हम पाबो गंगा ले गोदावरी चलिन । मरीन काबर हम अलिन-गलिन अटकन बटकन दही चटाका । झर झर पानी गिरे रचाका लउहा-लाटा बन के कांटा । चिखला हा गरीब के बांटा पाका पाका बेल ल खाबो । हमन मुक्ति के मारग पाबो छुये बेल के डारा टूटे । जीये के सब आसा छूटे भरे कटोरा हमरे फूटे । प्राण देह ले जइसे छूटे काऊ माऊ छाये जाला । दुनिया लागे घात बवाला अटकन बटकन दही चटाका । झर झर पानी गिरे रचाका लउहा-लाटा बन के कांटा । चिखला हा गरीब के बांटा -रमेश चौहान
दोहा चिट-पट दूनों संग मा, सिक्का के दू छोर । देवारी के आड़ मा, दिखे जुआ के जोर ।। डर हे छुछवा होय के, मनखे तन ला पाय । लक्ष्मी ला परघाय के, पइसा हार गवाय ।। कोन नई हे बेवड़ा, जेती देख बिजार। सुख दुख ह बहाना हवय, रोज लगे बाजार ।। कहत सुनत तो हे सबो, माने कोने बात । सबो बात खुद जानथे, करय तभो खुद घात ।। -रमेश चौहान
छत्तीसगढ़ी दोहा हर भाखा के कुछु न कुछु, सस्ता महंगा दाम । अपन दाम अतका रखव, आवय सबके काम ।। दुखवा के जर मोह हे , माया थांघा जान । दुनिया माया मोह के, फांदा कस तै मान।। ये जिनगी कइसे बनय, ये कहूं बिखर जाय । मन आसा विस्वास तो, बिगड़े काम बनाय ।। -रमेश चौहान .
का करि का हम ना करी, जनउला हे अबूझ । बात बिसार तइहा के, देखाना हे सूझ ।। देखाना हे सूझ, कहे गा हमरे मुन्ना हा । हवे अंधविश्वास, सोच तुहरे जुन्ना हा ।। नवा जमाना देख, कहूं तकलीफ हवय का । मनखे मनखे एक, भेद थोरको हवय का ।। -रमेश चौहान
मुच मुच मुचई गोरी तोर करेजा मा महुवा पागे मोर । सुन सुन के बोली धनी तोर तन मन मा नशा छागे मोर । चंदा देख देख लुकावत हे, छोटे बड़े मुॅह बनावत हे, एकसस्सू दमकत, एकसस्सू दमकत, गोरी चेहरा तोर ।। करेजा मा महुवा पागे मोर बनवारी कस रिझावत हे मन ले मन ला चोरावत हे, घातेच मोहत, घातेच मोहत, सावरिया सूरत तोर । तन मन मा नशा छागे मोर मारत हे हिलोर जस लहरा सागर कस कइसन गहरा सिरतुन मा, सिरतुन मा, अंतस मया गोरी तोर ।। करेजा मा महुवा पागे मोर छाय हवय कस बदरा आंखी समाय जस कजरा मोरे मन मा, मोरे मन मा जादू मया तोर । तन मन मा नशा छागे मोर मुच मुच मुचई गोरी तोर करेजा मा महुवा पागे मोर । सुन सुन के बोली धनी तोर तन मन मा नशा छागे मोर । मुच मुच मुचई गोरी तोर करेजा मा महुवा पागे मोर । सुन सुन के बोली धनी तोर तन मन मा नशा छागे मोर । -रमेशकुमार सिंह चैहान
राम राम कह राम, जगत ले तोला तरना । आज नही ता काल, सबो ला तो हे मरना ।। मृत्युलोक हे नाम, कोन हे अमर जगत मा । जप ले सीताराम, मिले हे जेन फकत मा ।। अपन उमर भर देख ले, का खोये का पाय हस । लइका पन ले आज तक, कतका तैं इतराय हस ।।
गीत : आज बंधे दो मन एक डोर में
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*मुखड़ा (युगल)*
आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में
आज बंधे दो मन एक डोर में
*अंतरा 1 (स...
पूर्वोत्तर भारत का महत्व
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पूर्वोत्तर भारत देश के पूर्वोत्तर भाग में स्थित है। यह आठ राज्यों अरुणाचल
प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा से बना
है। ...
परिवार का अस्तित्व
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परिवार का अस्तित्व
हम बाल्यकाल से पढ़ते आ रहे हैं की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं और समाज का
न्यूनतम इकाई परिवार है । जब हम यह कहते हैं कि मनुष्य ...
चार बेटा राम के कौडी के ना काम के
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चार बेटा राम के कौडी के ना काम के
छोइहा नरवा के दूनों कोती दू ठन पारा नरवरगढ़ के । बुड़ती म जुन्ना पारा अउ
उत्ती मा नवा पारा । जुन्नापारा मा गाँव के जुन...
मया के रंग
जवाब देंहटाएंऊँकर पदचाप
जलतरंग ।
रमेश भाई, आप बढिया लिखे हव,फेर एकरो ले सुघ्घर लिख सकत हव । "बृज अवधी सरिख छत्तीसगढी बन जातिस सूर तुलसी सरिख साहित्य हमला रचना हे।
मैथिली ल विद्यापति जइसे अमर बना दिहिस
वोही ढंग के भगीरथ प्रयास हमला करना हे ।"
आपके सुझाव माथा धरत आप ला परनाम
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