ऐ गोरी मोर, पैरी तोर, रून छुन बाजे ना । सुन मयारू बोल, ढेना खोल, मनुवा नाचे ना । कजरारी नैन, गुरतुर बैन, जादू चलाय ना । चंदा बरन रूप, देखत हव चुप, दिल मा बसाय ना । गोरी तोर प्यार, मोर अधार, जिनगी ल जिये बर । ये जिनगी तोर, गोरी मोर, मया मा मरे बर । कइसन सताबे, कभू आबे, जिनगी गढ़े बर । करव इंतजार, सुन गोहार, तोही ल वरे बर । .............रमेश ......................
एक राजर्षि की मूर्त कल्पना है शाहजहांपुर की पब्लिक लाइब्रेरी-प्रो रवीन्द्र
प्रताप सिंह
-
तकनीकी क्रांति के इस दौर में जब सब कुछ डिजिटल माध्यमों पर सिमटता जा रहा है,
तब भी किताबों का आकर्षण और महत्व कम नहीं हुआ है। किताबें केवल शब्दों…
2 हफ़्ते पहले