हम तो लईका संगी, आन नवा जमाना के । विकास गाथा गढ़बो, नवा नवा सोच ले ।। ऊॅच नीच के गड्ठा ला, आज हमन पाटबो । नवा रद्दा ला गढ़बो, नवा नवा सोच ले ।। जात पात धरम के, आगी तो दहकत हे । शिक्षा के पानी डारबो, नवा नवा सोच ले ।। भ्रष्टाचार के आंधी ला, रोकबो छाती तान के । ये देश ला चमकाबो, नवा नवा सोच ले ।। दारू मंद के चक्कर, हमला नई पड़ना । नशा के जाल तोड़बो, नवा नवा सोच ले ।। जवानी के जोश मा, ज्वार भाटा उठत हे । दुश्मन ला खदेड़बो, नवा नवा सोच ले ।। हर भाषा हमार हे, हर प्रांत हा हमार । भाषा प्रांत ला उठाबो, नवा नवा सोच ले ।। नवा तकनीक के रे, हन हमूमन धनी । तिरंगा ला फहराबो, नवा नवा सोच ले ।।
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
-
विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
2 दिन पहले