डुगुर-डुगुर डोले, बकर-बकर बोले, गांव के अली-गली मा, ओ दरूहा मनखे । कोनो ल झेपय नही, कोनो न घेपय नही, एखर-ओखर मेर, दत जाथे तन के ।। अपने ओरसावत, अपने च सकेलत, झुमर-झुमर झूम, आनी-बानी गोठ ला । ओ कोनो ला ना सुनय, ना ओ कोनो ला देखय, देखावत हे अपने, हाथ करे चोट ला ।।
कहिनी:पानी हे अमोल -डोरेलाल कैवर्त
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“‘ बिन पानी नि हे जिनगानी* ” ए कहना सोलाआना सिरतोन आय । पानी के बिना जिनगी
जिए के कल्पना घलो नि करे जा सके ? हमन सबो जानत हांवन…
3 हफ़्ते पहले