श्रृंगार दोहागीत जिंस पेंट फटकाय के, निकले जब तैं खोर । लिच लिच कनिहा हा करे, ऐ ओ गोरी तोर ।। देख देख ये रेंगना, कउँवा करें न काँव । मुक्का होगे मंगसा, परे तोर जब छाँव ।। देखइया देखत हवय, अपने आँखी फोर । लिच लिच कनिहा हा करे, ऐ ओ गोरी तोर ।। बरसउ बादर जस दिखे, लहरावत ये केश । मटक-मटक के रेंग के, मारे जब तैं टेश ।। रूप-रंग के तोर तो, गली-गली मा छोर । लिच लिच कनिहा हा करे, ऐ ओ गोरी तोर ।। नाजुक होगे गाल हा, केश करे जब चोट । लाल फूल दसमत खिले, अइसे तोरे ओट ।। छल-छल तो छलकत हवय, मुच-मुच मधुरस घोर । लिच लिच कनिहा हा करे, ऐ ओ गोरी तोर ।। दूनो भौं के बीच मा, चंदा आय लुकाय । सुरूज अपन रोषनी, तोरे मुँह ले पाय ।। नील कमल हा हे खिले, तोरे आंखी कोर ।। लिच लिच कनिहा हा करे, ऐ ओ गोरी तोर ।। अइसन सुंदर तैं दिखे, मिले नहीं उपमान । जेने उपमा ला धरॅंव, होथे तोरे अपमान ।। रोम-रोम बस ये कहय, तैं हा सपना मोर । लिच लिच कनिहा हा करे, ऐ ओ गोरी तोर ।। - रमेशकुमार सिंह चौहान
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
2 दिन पहले