आगी लगेे पिटरोल मा, बरत हवय दिन राती । मँहगाई भभकत हवय, धधकत हे छाती ।। कोरोना के मार मा, काम-बुता लेसागे । अउ पइसा बाचे-खुचे, अब तो हमर सिरागे ।। मरत हवन हम अइसने, अउ काबर तैंं मारे । डार-डार पिटरोल गा, मँहगाई ला बारे ।। सुनव व्यपारी, सरकार मन, हम कइसे के जीबो । मँइगाई के ये मार मा, का हम हवा ल पीबो ।। जनता मरहा कोतरी, मँहगाई के आगी । लेसत हे नेता हमर, बांधत कनिहा पागी ।। कोंदा भैरा अंधरा, राज्य केन्द्र के राजा । एक दूसर म डार के, हमर बजावत बाजा ।। दुबर ल दू अषाढ़ कस, डहत हवय मँहगाई । हे भगवान गरीब के, तुँही ददा अउ दाई ।। -रमेश चौहान
लघुकथा : मेडल -डॉ. विनोद कुमार वर्मा
-
एक छह फीट ऊँचे गबरू जवान की नियुक्ति सब-इंसपेक्टर के पद पर
यातायात पुलिस में तीन बरस पहले हुई थी। उसकी सेना में भर्ती की तमाम कोशिशें
नाकाम हुई…
2 दिन पहले