शनिवार, 15 अगस्त 2015

चिंतन

धरम धरम के शोर हे, जाने धरम ल कोन ।
कट्टर मन चिल्लाय हे, धरमी बइठे मोन ।।

पंथ पंथ के खेल ले, खेले काबर खेल ।
एक पेड़ के हे तना, तभो दिखय ना मेल ।।

अपन सुवारथ मा करे, धरम करम के मोल ।
हत्या आस्था के करे, अपने बजाय ढोेल ।।

भक्त बने के साध मा, मनखे हे बउराय ।
गिद्ध बाज मन ला घला, अपनेे गुरू बनाय ।।

गुरू भक्ति के जोश मा, माने ना ओ बात ।
छोड़ सनातन बात ला, रचे अपन औकात ।।

एक गांठ हरदी धरय, अइसन गुरू हजार ।।
चार वेद हा सार हे, होये पंथ हजार ।

बेटा मारे बाप ला, अपन ल बड़े बताय ।
अइसन गुरू घंटाल हा, अपने पंथ बनाय ।।

बाट सनातन धर्म ला, डंका अपन बजाय ।
सागर मा होकेे खड़ा, सागर खुदे कहाय ।।

भेद संत के कोन हा, आज जान हे पाय ।
संत कभू बाजार मा, ठाठ-बाठ देखाय ।।

ज्ञानी घ्यानी संत हा, करे सनातन गान।
अपन बड़ाई छोड़ के, करथे सबके मान ।।

परम तत्व केे खोेज मा, रहिथे जेन सहाय ।
जंगल झाड़ी हे कहां, हमला कोन बताय ।।

अपन अपन आस्था हवय, धरव जिहां मन भाय ।
धरे हवस तैं जान के, बिरथा दोश लगाय ।।

तोरे आस्था हे बड़े, मोर कहां कमजोर ।
जाबो एके घाट मा, जिहां बसे चितचोर ।।

तोरे आस्थ हा गढ़े, कोनो ला भगवान ।
पथरा पथरा ला मिले, तभे इहां सम्मान ।।