सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

नारी ले घर परिवार हे

//दोहा मुक्तक//

1.
बड़ आंगा-भारू लगय, मनखे के संसार ।
पहिली नर भारी लगिन, अब तो लगथे नार ।।
जेन सुवारी हा कहय, होथे ओही काम ।
जावर जीयर संग मा,बइठे अलगे डार ।
2.
बरगद हा छतनार हे, डारा पाना संग ।
गूॅथे माला फूल ले, मन मा भरे उमंग ।।
लकड़ी गठरी पोठ हे, बंधे एके डोर ।
बसव एक परिवार मा, घोर मया के रंग ।।
3.
नारी ले घर परिवार हे, नारी ले संसार ।
चाहे ओ उबार लय, के बोरय मझधार ।
नारी चाहय जोर लय, चाहय देवय टोर ।
बांध धरव ये गोठ ला, बेटी बहू हमार ।
4.
पोथी पतरा तैं पढ़े, पढ़े नही संस्कार ।
बने बनय कइसे तुहर, सास ससुर ससुरार ।।
लइका बच्चा अउ धनी, अतके मा भूलाय ।
अइसन मा कइसे भला, बनही घर परिवार ।।
5.
अलग अलग हे अंगरी, एक हाथ के तोर ।
तभो तोर ओ हाथ हे, राखे का तैं टोर ।।
गुण अवगुण सब मा भरे, देखव सोच विचार ।
काबर मइके मा हवस, अपन धनी ला छोड़ ।।
6.
पथरा मा मूर्ति गढ़व, जइसे तोरे सोच ।
साज सजावट कर बने, माथा कलगी खोच ।।
जन्मजात तो पाय हव, हुनर गढ़े के झार ।
छिनी हथौड़ी हाथ धर, धीरे धीरे टोच ।।