शनिवार, 12 मार्च 2016

नाचत गात मनावत होरी

ढोलक मादर झांझ बजावत
हाथ लमावत गावत फागे।
मोहन ओ छलिया नट नागर
रास रचावव रंग जमाके ।
आवव आवव भक्त बुलावत।
गावत फाग उडावत रोरी ।
फागुन मा रसिया रस लावत
नाचत गात मनावत होरी ।।

हे सकलावत आवत जावय
छांट निमार बनावत टोली ।
भांग धरे छलकावत जावत
बांटत बांटत ओ हमजोली।
रंगत संगत के दिखथे जब
रंग लगाय करे मुॅह-जोरी
छोट बड़े सब भेद भुलावत
नाचत गात मनावत होरी ।।

हाथ धरे पिचका लइका मन
रंग भरे अउ मारन लागे ।
आवय जावय जेन गलीन म
ओहर तो मुॅह तोपत भागे ।
मारत हे पिचका मुॅह ऊपर
ओ लइका मन हा बरजोरी  ।
आज बुरा मत मानव जी कहि
नाचत गात मनावत होरी ।।

हाथ गुलाल धरे दउडावत
नंनद देखत भागत भौजी ।
भागत देखत साजन आवय
रंग मले मुॅह मा मन मौजी ।
रंगय साजन रंग म हाॅसत
लागय ओ जस चांद चकोरी
रंगय रंग दुनों इतरावत
नाचत गात मनावत होरी ।।