बुधवार, 9 मार्च 2016

दाेहा के मरम

कविता के हर शब्द मा, अनुशासन के बंद ।
आखर आखर के परख, गढ़थे सुघ्घर छंद ।।

चार चरण दू डांड़ के, होथे दोहा छंद ।
तेरा ग्यारा होय यति, रच ले तै मतिमंद ।।

विषम चरण के अंत मा, रगण नगण तो होय ।
तुक बंदी  सम चरण रख, अंत गुरू लघु होय ।।

समुदर ला धर दोहनी, दोहा हा इतराय ।
अंतस बइठे जाय के, अपने रंग जमाय ।।

बात बात मा बात ला, मनखे ला समझाय ।
दोहा अइसन छंद हे, जेला जन जन भाय ।।

दोहा हिन्दी साहित्य के, बने हवय पहिचान ।
बीजक संत कबीर के, तुलसी मानस गान ।।

छत्तीसगढ़ी मा घला, दोहा के हे मान ।
धनीधरम जी हे रचे, जाने जगत जहान ।।

विप्र दलित मन हे रचे, रचत हवे बुधराम ।
अरूण निगग ला देख ले, रचत हवय अविराम  ।।

बोली ले भासा गढ़ी, रखी सोच ला रोठ ।
शिल्प विधा मा हम रची, जुर मिल रचना पोठ ।।

अनुसासन के पाठ ले, बनथे कोनो छंद ।
देख ताक के शब्द रख, बन जाही मकरंद ।।

छोट बुद्धि तो मोर हे, करत हंवव परयास ।
चतुरा चतुरा बड़ हवय, लाही जेन उजास ।।