ओही सूरज चांद हे, ओही हे आकाश।
कहे जमाना गे बदल, कोन करे विश्वास ।।
कोन करे विष्वास, बिना पाछू आघू हे।
नेह बिना घर द्वार, लगे कोनो जादू हे ।।
डोरी बिना पतंग, गगन मा कदर ल खोही ।
उलंबा तोर सोच, जगत ओही के ओही ।।
कहे जमाना गे बदल, कोन करे विश्वास ।।
कोन करे विष्वास, बिना पाछू आघू हे।
नेह बिना घर द्वार, लगे कोनो जादू हे ।।
डोरी बिना पतंग, गगन मा कदर ल खोही ।
उलंबा तोर सोच, जगत ओही के ओही ।।
बहुत सुन्दर राकेश भाई।
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर रमेंश भाई।
हटाएंबहुत सुन्दर रमेंश भाई।
हटाएंबहुत सुन्दर राकेश भाई।
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