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कतका झन देखे हें-

मुक्तक

मुक्तक
122 222, 221 121 2
सुते मनखे ला तै, झकझोर उठाय हस ।
गुलामी के भिथिया, तैं टोर गिराय हस ।।
उमा सुत लंबोदर, वो देश ल देख तो ।
भरे बैरी मन हे, तैं आज भुलाय हस ।
-रमेश चौहान

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