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संदेश

कतका झन देखे हें-

हे भारत महतारी

हे भारत महतारी  परणाम हवय गाड़ा-गाड़ा,   हे भारत महतारी  । तोरे महिमा कइसे गावव,  दुनिया मा ये भारी ।। परणाम हवय गाड़ा-गाड़ा,   हे भारत महतारी  । तोरे महिमा कइसे गावव,  दुनिया मा ये भारी ।। हे भारत महतारी  हे भारत महतारी  हे भारत महतारी  लहर-लहर नदियां लहरावय, सरर-सरर पुरवाही। रुख -राई  गमगम ले गमके, फर धर हाही-माही।। खेतखार अउ अरिया-परिया,  हरियर-हरियर छाये। जंगल-झाड़ी सागर परवत, सबके मन ला भाये ।। लइका मन के पेट भरे बर,  धरे परोसा थारी। परणाम हवय गाड़ा-गाड़ा,   हे भारत महतारी  । हे भारत महतारी  हे भारत महतारी  हे भारत महतारी  गुरतुर-गुरतुर भाखा बोली, गुरतुर हॅंसी ठिठोली। लुकलुक ले चंदा चंदैनी, सूरत सुग्घर भोली ।। तोरे लइका जयकार करत, सुर म सुर मिलाये। महतारी के रक्षा खातिर, मुड़ मां कफ़न बंधाये ।। हम तो बारा घला बजाबो,  नो हय झूठ लबारी । परणाम हवय गाड़ा-गाड़ा,   हे भारत महतारी  । हे भारत महतारी  हे भारत महतारी  हे भारत महतारी   -रमेश चौहान...

स्कूल के टूर

  आज स्कूल के टूर मा, घूमेन ठउर पांच । कौशिल्या मां ठउर ले, घूचापाली सांच । राजिम चम्पारण ठउर,  खल्लारी तो गेन। संग संगवारी चारझन, खूब मज़ा तो लें । कौशिल्या माता राम के, भाचा हमरे राम । चंदखुरी सुघ्घर गांव से, जे कौशिल्या धाम ।। राजीव लोचन झरझर, महानदी के धार । पैरी सोढुर के मेल ले, हरय पाप ला झार ।। जगन्नाथ के रुप हे, ये लोचन राजीव । दरस परस  जब करें हन,  होंगे भक्ति संजीव । चंपारण वल्लभ प्रगट, गढ़े भक्ति के धाम । श्याम श्याम मन श्याम भज, जो एकै आधार । खल्लारी माता धाम मा, सीढ़ी बने हजार । जय माता जयकार ले,  मन हा भरे हमारे ।। घूचापाली मां हवय, मां चण्डी दरबार । जिहां करें हे आरती, भालू जंगल कार ।। मजा खूब हमला मिलिस, सब संगवारी संग । खूब घूमेन जुरमिल हम , मन मा रहिस उमंग ।

तोर-मोर

  तोर-मोर माया घोर हे, न ओर हे ना छोर । तोर ह तो तोरे  हवय,  अउ मोरे हा मोर ।। कोनो ला माने अपन, हो जाही ओ तोर। घर के खपरा ला घला, कहिथस तैं हा मोर ।। मोर कहे मा मोर हे, तोर कहे मा तोर। मया मोर मा हे घुरे, तोर कहे ला छोर।। ना जान न पहिचान हे, तब तक तैं अनजान। माने तैं ओला अपन, होगे तोर परान ।। माने मा पथरा घला, हवय देवता तोर । लकड़ी के खम्भा घला, हवय देवता मोर ।। मन के माने मान ले,  माने मा सब तोर । तोर-मोर ला छोड़ के, कहि ना  सब ला मोर ।।

तीर्थ यात्रा

 दरस-परस बर हम आयेंन, मन के मनौती ल पायेंन सिहोर के दरस पायेंन, कुबरेश्वर के सरस पायेंन । कंकर-कंकर शिव के आशीष संग लायेंन ।। नलखेड़ा के परस कर आयेंन, तंत्र-मंत्र देख-सुन आयेंन दाई के दया अपन झोली भर लायेंन । महाकाल के अवंतिका, क्षीप्रा के रामघाट, कर अंजन स्नाना, तन-मन धो आयेंन । माघे पुन्नी कथा कर आयेंन  शिव शंभू संग रमापति ल रिझायेंन ।। महाकाल, कालभैरव मंगलनाथ गढ़कालिका हरसिद्धि चिंताहरण गनराज कृष्ण गुरुकुल के दरशन पायेंन। राम के चमत्कार ओरछा के रामराजा राजा राम रामराजा के दरस पायेंन। दतिया के मां पिताम्बरा धूमावती शांत सरल साक्षात मां के आभा पायेंन। बागेश्वर धाम के बाबा संन्यासी रामभक्त हनुमंत विकट राशि लखर भक्त अलबेला देख आयेंन हनुमान लला के कृपा पायेंन । हजार सिढ़िया के चढ़ाई चढ़ आयेंन महैर के शारद माई के मया धर आयेंन ।।

चामर छंद'-मनखे

मनखे के सुभाव मोर तोर तोर मोर पोर पोर हे घुरे मोर तोर तोर मोर के सुभाव हा चुरे लोभ मोह लोक लाज छोड़ तान अड़े खोर खोर के गली गली ल छेक तैं खड़े

श्रृंगारिक फागगीत

 श्रृंगारिक फागगीत चल हां गोरी, तोर नयना म जादू हे चल हां गोरी, तोर नयना म जादू हे, मोला करे बिभारे ।।टेक।। चल हां गोरी, तोर नयना म का घुरे हे, अउ का के करथे गोठ।।1।। चल हां गोरी, तोर नयना म मया घुरे हे, अउ मया के करथे गोठ ।।2।। चल हां गोरी, तोर नयना म का लगे हे, अउ दिखय कोने रंग ।।3।। चल हां गोरी, तोर नयना म जादू लगे हे, जेमा दिखय मया के रंग ।।4।। चल हां मयारुक, तोर मया म बहिया हँव चल हां मयारुक, तोर मया म बहिया हँव, जेमा बिगड़े मोरे चाल ।।टेक।। चल हां मयारुक, कहां जाके मैं लुकॉंव, अउ कहां पावँव चैन ।।1।। चल हां मयारुक, तोर गली म जाके लुकॉंव, अउ तोर दरस म पावँव चैन ।।2।। चल हां मयारुक,  मोला काबर नई लगय पियास, अउ काबर नई लगय भूख।।3।। चल हां मयारुक, तोर दरस बिन नई लगय पियास, अउ मिलन बिन ना लागय भूख ।।4।। -रमेश चौहान

पारंपरिक फागगीत

 पारंपरिक फागगीत चलो हां यशोदा धीरे झुला दे पालना चलो हो यशोदा धीरे झुला दे पालना तोर ललना उचक न जाय ।।टेक।। चलो हां यशोदा काहेन के पालना बनो है, तोर काहेन लागे डोर ।।1।। चलो हां यशोदा चंदन, काट पालना बनो हैं तोर रेशम लोग डोर ।।2।। चलो हां कदम तरी ठाढ़े भिजगै श्‍यामरो चलो हां कदम तरी ठाढ़े भिजगै श्‍यामरो केशर के उड़ै बहार ।।टेक।। चलो हां कदम तरी कै मन के सरगारो हे, कै मन उडै गुलाल ।।1।। चलो हां कदम तरी नौ मन के सरगारो हे, दस मन उडै गुलाल ।।2।। चलो हां राधा तोर चुनरी के कारन मे चलो हां राधा तोर चुनरी के कारन मे कन्‍हैया ने हो गई चोर ।।टेक।। चलो हां राधा कोन महल चोरी भयो है, तोर कोन महल भई लुट ।।1।। चलो हां राधा रंग महल चोरी भयो है, तोर शीश महल भई लुट ।।2।। चलो हां अर्जुन मारो बाण तुम गहि गहि के चलो हां अर्जुन मारो बाण तुम गहि गहि के, रथ हाके श्रीभगवान ।।टेक।। चलो हां अर्जुन कै मारै कै घायल है, कै परे सगर मैदान ।।1।। चलो हां अर्जुन नौ मारे दस घायल है, कई परे सगर मैदान ।।2।। चलो हां राम दल घेर लियो लंका को चलो हां राम दल घेर लियो लंका को, लंका के दसो द्वार ।। टेक।। चलो हां राम दल काहन...

फागुन महीना

फागुन फगुआ फाग के, रास रचे हे राग । महर-महर ममहाय हे, बगर-बगर के बाग ।। बगर-बगर के बाग, बलावय बसंत राजा । जाग जुड़ावत जाड़ हे, घमावत घमहा बाजा ।। राचय रास रमेश, संग मा संगी सगुआ । सरसो परसा फूल, लजावय फागुन फगुआ ।।

जवानी के जड़काला

जड़काला म जाड़ लगे, गरमी म लगे घाम । बाढ़े लइका मा लगय, मया प्रीत के खाम ।। मया प्रीत के खाम, उमर मा लागे आगी । उडहरिया गे भाग, छोर अपने घर के  पागी ।। सुनलव कहय रमेश, छोड़ पिक्‍चर के माला । मरजादा ला ओढ़, जवानी के जड़काला ।।

कइसे कहँव किसान ला भुइया के भगवान

कइसे कहँव किसान ला, भुइया के भगवान । लालच के आगी बरय, जेखर छतिया तान ।। जेखर छतिया तान, भरे लालच झांकत हे । खातू माटी डार, रोग हमला बांटत हे ।। खेत म पैरा बार, करे मनमानी जइसे । अपने भर ला देख, करत हे ओमन कइसे ।। घुरवा अउ कोठार बर, परिया राखँय छेक । अब घर बनगे हे इहाँ, थोकिन जाके देख ।। थोकिन जाके देख, खेत होगे चरिया-परिया । बचे कहाँ हे गाँव, बने अस एको तरिया ।। ना कोठा ना गाय, दूध ना एको चुरवा । पैरा बारय खेत, गाय ला फेकय घुरवा ।। नैतिक अउ तकनीक के, कर लौ संगी मेल । मनखे हवय समाज के, खुद ला तैं झन पेल ।। खुद ला तैं झन पेल, अकेल्‍ला के झन सोचव । रहव चार के बीच, समाजे ला झन नोचव । सुनलव कहय ’रमेश’, देश के येही रैतिक । सब बर तैं हर जीय, कहाथे येही नैतिक ।। -रमेश चौहान

सुरहोत्‍ती

सुरहोत्‍ती ये गॉंव के, हवय सरग ले नीक । मंदिर-मंदिर मा जले, रिगबिग दीया टीक ।। रिगबिग दीया टीक, खेत धनहा डोली मा । घुरवा अउ शमशान, बरत दीया टोली मा । सुनलव कहय रमेश, देख तैं चारों कोती । हवय सरग ले नीक, गॉंव के ये सुरहोत्‍ती ।।

आगी लगेे पिटरोल मा,

आगी लगेे पिटरोल मा, बरत हवय दिन राती । मँहगाई भभकत हवय, धधकत हे छाती ।। कोरोना के मार मा, काम-बुता लेसागे । अउ पइसा बाचे-खुचे, अब तो हमर सिरागे ।। मरत हवन हम अइसने, अउ काबर तैंं मारे ।  डार-डार पिटरोल गा, मँहगाई ला बारे ।। सुनव व्‍यपारी, सरकार मन,  हम कइसे के जीबो । मँइगाई के ये मार मा, का हम हवा ल पीबो ।।  जनता मरहा कोतरी,  मँहगाई के आगी । लेसत हे नेता हमर, बांधत कनिहा पागी ।।   कोंदा भैरा अंधरा, राज्‍य केन्‍द्र के राजा । एक दूसर म डार के, हमर बजावत बाजा ।। दुबर ल दू अषाढ़ कस, डहत हवय मँहगाई । हे भगवान गरीब के, तुँही ददा अउ दाई ।। -रमेश चौहान

चल देवारी मनाबो मया प्रीत घाेेर के

घनाक्षरी लिपे-पोते घर-द्वार, झांड़े-पोछे अंगना चुक-चुक ले दिखय, रंगोली खोर के । नवा-नवा जिंस-पेंट, नवा लइका पहिरे, उज्‍जर दिखे जइसे,  सूरुज ए भोर के ।। रिगबिग-रिगबिग, खोर-गली घर-द्वार रिगबिग दीया-बाती, सुरुज अंजोर के । मन भीतर अपन,  तैं ह संगी अब तो, रिगबिग दीया बार, मया प्रीत घाेेर के  ।।

हमू ल हरहिंछा जान देबे

 हमू ल हरहिंछा जान देबे    मैं सुधरहूं त तैं सुधरबे । तै सुधरबे त वो । जीवन खो-खो खेल हे एक-दूसर ल खो ।। सेप्टिक बनाए बने करे, पानी, गली काबर बोहाय । अपन घर के हगे-मूते म हमला काबर रेंगाय ।। गली पाछू के ल सेठस नहीं, आघू बसे हस त शेर होगेस । खोर-गली ल चगलत हवस, अपन होके घला गेर होगेस । अपन दुवारी के खोर-गली कांटा रूंधे कस छेके हस । गाड़ा रवन रहिस हे बाबू, काली के दिन ल देखे हस ।। मनखे होबे कहूं तै ह संगी, हमू ल मनखे मान लेबे । अपन दुवारी के खोर-गली म, हमू ल हरहिंछा जान देबे ।। -रमेश चौहान

तीजा तिहार

तीजा तीज तिहार मा, मांगे हें अहिवात । दिन भर रहे उपास अउ, जागे वो हा रात । जागे वो हा रात, खुशी पति के हे मांगे । पत्नी के ये काम, जगत मा ऊंपर टांगे । सुनलव कहे "रमेश", ठेठरी धर छोड़व पीजा । अपन ह अपने होय, कहत हे हमरे तीजा ।।

आठे कन्‍हईया के गीत-भादो के महिना

आठे कन्‍हईया के गीत-भादो के महिना भादो के महीना, घटा छाये अंधियारी, बड़ डरावना हे, ये रात कारी कारी । कंस के कारागार, बड़ रहिन पहरेदार, चारो कोती चमुन्दा, खुल्ला नइये एकोद्वार । देवकी वासुदेव करे पुकार, हे दीनानाथ, अब दुख सहावत नइये, करलव सनाथ । एक-एक करके छै, लइका मारे कंस, सातवइया घला होगे, कइसे अपभ्रंस । आठवइया के हे बारी, कइसे करिन तइयारी, एखरे बर करे हे, आकाशवाणी ला चक्रधारी । मन खिलखिलावत हे, फेर थोकिन डर्रावत हे, कंस के काल हे, के पहिली कस एखरो हाल हे । ओही समय चमके बिजली घटाटोप, निचट अंधियारी के होगे ऊंहा लोप । बिजली अतका के जम्मो के आंखी-कान मुंदागे, दमकत बदन चमकत मुकुट, चार हाथ वाले आगे । देवकी वासुदेव के, हाथ गोड़ के बेड़ी फेकागे, जम्मो पहरेदारमन ल, बड़ जोर के नींद आगे । देखत हे देवकी वासुदेव, त देखत रहिगे, कतका सुघ्घर हे, ओखर रूप मनोहर का कहिबे । चिटिक भर म होइस, उंहला परमपिता के भान, नाना भांति ले, करे लगिन उंखर यशोगान । तुहीमन सृष्टि के करइया, जम्मो जीव के देखइया  धरती के भार हरइया, जीवन नइया के खेवइया । मायापति माया देखाके होगे अंतरध्यान, बालक रूप म प्रगटे आज तो भगवान । प...

ये राखी तिहार

 ये राखी तिहार ये राखी तिहार, लागथे अब, आवय नान्हे नान्हे मन के । भेजय राखी, संग मा रोरी, दाई माई लिफाफा मा भर के । माथा लगालेबे, तै रोरी भइया, बांध लेबे राखी मोला सुर कर के । नई जा सकंव, मैं हर मइके, ना आवस तहू तन के । सुख के ससुरार भइया दुख के मइके, रखबे राखी के लाज जब मै आवंह आंसू धर के ।

खेले बिजली खेल

 खेले बिजली खेल (कुण्डलियां) चमनी-कंड़िल हे नहीं, नइ हे माटीतेल । अंधियार तो घर परे, खेले बिजली खेल ।। खेले बिजली खेल, कहत मोला छू लेवव । खेलत छू-छूवाल, दॉव मोरे दे देदव ।। धन-धन हवय ‘रमेश’, टार्च मोबाइल ठिमनी ।। घर मा लाइन गोल, नई हे कंडिल-चिमनी ।।

बेटी-बहू

बेटी-बहू बेटी हमरे आज के, बहू कोखरो काल । बहू गढ़य परिवार ला, राखय जोर सम्हाल ।। राखय जोर सम्हाल, बहू जइसे हे चिरई । तिनका-तिनका जोर, खोंधरा ओखर बनई ।। सास-ससुर मां बाप, मान राखय जी तुहरे । सुग्घर बहू कहाय, मान तब बेटी हमरे ।।

नीति के दोहा

नीति के दोहा करना धरना कुछ नहीं, काँव-काँव चिल्लाय । खिंचे दूसर के पाँव ला, हक भर अपन जताय ।। अपन काम सहि काम नहीं, नाम जेखरे कर्म । छोड़ बात अधिकार के, काम करब हे धर्म ।। कहां कोन छोटे बड़े, सबके अपने मान । अपन हाथ के काम बिन, फोकट हे सब ज्ञान ।। जीये बर तैं काम कर, कामे बर मत जीय । पइसा ले तो हे बडे, अपन मया अउ हीय ।। ए हक अउ अधिकार मा, कोन बड़े हे देख । जान बचावब मारना, अइसन बात सरेख ।। -रमेश चौहान

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