मंगलवार, 10 नवंबर 2015

अइसे दीया बार

अपने मन के कोनहा, अइसे दीया बार ।
रिगबिग रिगबिग तो दिखय, तोरे अवगुण झार ।।

अपन कमी ला जान के, काही करव उपाय ।
बाचय मत एको अकन, मन मा तोरे समाय ।।
देवारी दीया हाथ धर, अवगुण ला तैं मार । अपने मन के कोनहा...

हमरे सुधरे मा जगत, सुधरय पक्का जान ।
छोड़ गरब गुमान अपन, छोड़ अपन अभिमान ।।
अपन मया के बंधना, बांधव जी संसार ।। अपने मन के कोनहा...

तोरे कस तो आन हे, सुघ्घर के इंसान ।
ना कोनो छोटे बड़े, ना कोनो हैवान ।।
हवय भुले भटके भले, ओला तैं सम्हार । अपने मन के कोनहा...


जाति पाति अउ पंथ के, कर देबो अब अंत ।
मनखे  हा मनखे रहय, मन से होबो संत ।।
राम राज के कल्पना, करबो हम साकार । अपने मन के कोनहा...