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कतका झन देखे हें-

लाज के छिलका

छिलका भीतर रस भरे, आमा गजब मिठाय ।
आमा के ये स्वाद ला, छिलका रखय बचाय ।।
छिलका रखय बचाय, घाम धुर्रा बैरी ले ।
तरिया नरवा पार, रखय पानी गहरी ले ।
पानी हर बोहाय, होय जब पार म भुलका ।
रख ले तन के लाज, खोल मत ऐखर छिलका ।।

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