बुधवार, 18 दिसंबर 2013

गुरू घासी दास बबा



गुरु घासी दास बाबा,  सत के  अलख जगायें ये धाम म  ।
सत के अलख जगायें ये धाम म ...2

सादा तोर खम्भा बाबा, सादा तोर धजा ,
सादा तोर धजा बाबा, सादा तोर धजा,
सत के धजा फहरायें ये धाम म ।

मनखे मनखे एक होथे, मनखे ल बतायें
मनखे ल बतायें बाबा, मनखे ल बतायें
मनखे  मन के छुवाछूत ल मिटायें ये धाम म ।

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

अब मान जा ना रे जोही

रतिहा के गुसीआएं, अब ले बोलत नई अस ।
अब मान जा ना रे जोही, मोर जीयरा जरय। अब मान जा...

कोयली कस बोली, तोर हसी अऊ ठिठोली,
सुने बर रे पिरोहील, मोर मनुवा तरसय । अब मान जा...

चंदा बरन तोर रूप, राहू कस गुस्सा घूप,
लगाय हे रे ग्रहण, अंधियार अस लागय । अब मान जा...

तोर गोरी गोरी गाल, गुस्सा म होगे ह लाल,
तोर गुस्सा  ह रे बैरी, आगी कस बरय । अब मान जा...

होही गलती मोर, मै कान धरव
तोर मया बर रे संगी, मै घेरी घेरी मरव । अब मान जा...
...............................
.रमेश

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

हे महामाई

हे महामाई दया कर, हम नवावन माथ ला ।
भक्त सब जष तोर गावन, छोड़ बे झन मां साथ ला ।
तोर सीवा मोर दाई, कोन हे साथी भला ।
जांच जग ला देख डरे हन, स्वार्थ मा भूले भला ।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

ये गोरी मोर



ऐ गोरी मोर, पैरी तोर, रून छुन बाजे ना ।
सुन मयारू बोल, ढेना खोल, मनुवा नाचे ना ।
कजरारी नैन, गुरतुर बैन, जादू चलाय ना ।
चंदा बरन रूप, देखत हव चुप, दिल मा बसाय ना ।

गोरी तोर प्यार, मोर अधार, जिनगी ल जिये बर ।
ये जिनगी तोर, गोरी मोर, मया मा मरे बर ।
कइसन सताबे, कभू आबे, जिनगी गढ़े बर ।
करव इंतजार, सुन गोहार, तोही ल वरे बर ।
.............रमेश ......................

बुधवार, 20 नवंबर 2013

ददरिया



अमुवा के डार, बांधे हवंव झूलना ।
चल संगी झुलबो, बांह जोरे ना ।। चल संगी झूलबो

मोर आंखी म तै, तोर आंखी म मै ।
आंखी म आंखी, मिलाबो हमन ना ।। चल संगी झूलबो

मोंगरा के फूल, सजाहंव बेनी तोर ।
तोर रूप मनोहर, बसाहंव दिल मा ना ।। चल संगी झूलबो

मया के चिन्हा, अंगरी म मुंदरी
आजाबे रे संगी, पहिराहंव तोला ना ।। चल संगी झूलबो

तै मोर राधा गोई, मै किसन बिलवा
मया के बसुरी, बजा हू मै ह ना । चल संगी झूलबो

मै तोर लोरिक गोई, तै मोर बर चंदा ।
जान के बाजी, मै हर लगा दूहू ना ।। चल संगी झूलबो

आनी बानी के सपना, संजोहव आंखी म ।
बिहा के तोला, ले जाहू अपन अंगना । चल संगी झूलबो

........................................................
- रमेशकुमार चौहान
नवागढ जिला बेमेतरा

शनिवार, 9 नवंबर 2013

छत्तीसगढ़ महतारी


हे दाई छत्तीसगढ़, हाथ जोड़ परनाम।
घात मयारू तैं हवस, दया मया के धाम ।
दया मया के धाम, सांति सुख तै बगरावत ।
धन धन हमर भाग, जिहां तो हम इतरावत ।।
धुर्रा माटी तोर, सरग ले आगर भाई।
होवय मउत हमार, तोर कोरा हे दाई ।।1।।

महतारी छत्तीसगढ़, करत हंव गुनगान ।
अइसन तोरे रूप हे,  कइसे होय बखान ।।
कइसे होय बखान, मउर सतपुड़ा ह छाजे ।
कनिहा करधन लोर, मकल डोंगरी बिराजे ।।
पैरी साटी गोड, दण्ड़कारण छनकारी ।
कतका सुघ्घर देख, हवय हमरे महतारी ।।2।।

महतारी छत्तीसगढ़, का जस गावन तोर ।
महानदी शिवनाथ के, सुघ्घर कलकल शोर ।।
सुघ्घर कलकल शोर, इंदरावती सुनावय ।
पैरी खारून जोंक, संग मा राग मिलावय ।।
अरपा सोंढुर हाॅफ, हवय सुघ्घर मनिहारी ।
नदिया नरवा घात, धरे कोरा महतारी ।।3।।

महतारी छत्तीसगढ़, सुघ्घर पावन धाम ।
धाम राजीम हे बसे, उत्ती मा अभिराम ।।
उत्ती मा अभिराम, हवय बुड़ती बम्लाई ।
अम्बे हे भंडार, अम्बिकापुर के दाई ।
दंतेसवरी मोर, सोर जेखर बड़ भारी।
देत असिस रक्सेल, सबो ला ये महतारी ।।4।।

महतारी छत्तीसगढ़, तोर कोरा म संत ।
कतका देव देवालय, कतका साधु महंत ।।
कतका साधु महंत, बसय दामाखेड़ा मा ।
कबीर निरगुन भक्ति, जगावय जग बेड़ा मा ।।
सत के साधक संत, बसे गिरउध सुखकारी ।
चारो खुट बगराय, ग्यान हमरे  महतारी ।।5।।

महतारी छत्तीसगढ़, हम जस गावन तोर ।
आनी बानी गीत ले, जग बगरावन सोर ।।
जग बगरावन सोर, देश दुनिया मा दाई ।
ददरिया सुवा गीत, फाग जस करमा गाई ।।
पंथी डंडा नाच, तोर सुघ्घर चिनहारी ।
नाचत गावत बात, सुनावत हन महतारी ।।6।।

महतारी छत्तीसगढ़, कतका हवस महान ।
तोरे कोरा मा हवय, लइका बहुत सुजान ।।
लइका बहुत सुजान, कपट छल नइ तो जाने ।
मनखे मनखे देख, सबो ला मनखे माने ।।
माथ, नवाय रमेश‘, करत तोरे बलिहारी ।
जय हो जय हो तोर, सुगढ़ हस तै महतारी ।।7।।

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

काटा म जब काटा चुभाबे


काटा म जब काटा चुभाबे, तभे निकलथे काटा पांव ।
कटे ल अऊ काटे ल परथे, त जल्दी भरते कटे घांव ।।

लोहा ह लोहा ला काटथे, तब बनथे लोहा औजार ।
दुख दुख ला काटही मनखे, ऐखर बर तै रह तइयार ।।

जहर काटे बर दे ल परथे, अऊ जहर के थोकिन डोज ।
गम भुलाय ल पिये ल परथे, गम के पियाला रोज रोज ।।

प्रसव पिरा ला जेन ह सहिथे, तीनो लोक ल जाथे जीत ।
धरती स्वर्ग ले बड़े बनके, बन जाथे महतारी मीत ।।

दरद मा दरद नई होय रे, दरद के होथे अपन भाव ।
दरद सहे म एक मजा होथे, जब दरद म घला होय चाव ।।

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

काबर करय दुख



मनखे काबर करय दुख, भूला के बिसवास।
दुख के भीतर हवय सुख, इही जगत के आस ।।
इही जगत के आस, रिकोथे तेन समोथे ।
हमर कहां अवकात, सबो ओही पुरोथे ।।
घट घट जेखर वास, कोन ओला परखे ।
छोड़ संसो चिंता, करम भर कर मनखे।।

...........‘रमेश‘.................

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

हे जिबरावत गोरी





काजर आंजत मुंह सजावत देख लजावत दर्पण छोरी ।
केस सजावत फूल लगावत खुद ल देखत भावत छोरी ।
आवत जावत रेंगत कूदत नाचत गावत देखत गोरी ।
काबर मुंह बनावत मुंह लुकावत हे जिबरावत गोरी ।

......................रमेश.....................

चार दिन के सगा घरोधिया होगे

चार दिन के सगा घरोधिया होगे ।
मोर घर के मन ह, परबुधिया होगे ।।1।।

का जादू करंजस, अइसन होईस रे
अपन समझेव, तेन बहुरूपिया होगे ।।2।।

कोनो ल सुहावत नईये मोरो भाखा
कइसन मोर लईका मन शहरिया होगे ।।3।।

घात फबयत रहिस भाखा के लुगरा
का करबे ओही लुगरा फरिया होगे ।।4।।

मोर बडका बड़का रहिस महल अटारी,
आज कइसन सकला के कुरिया होगे ।।5।।

जेन लईका ल पढायेंव तेने कहा अड़हा
लाज म मोर मुंह करिया करिया होगे ।।6।।

अपन घर ल पहिचान बाबू सपना ले जाग
देख निटोर के अब तो बिहनिया हो

बुधवार, 18 सितंबर 2013

मोर मयारू गणेश

दोहा -    सबले पहिले होय ना, गणेश पूजा तोर ।
    परथ हवं मै गोड़ गा, विनती सुन ले मोर ।।

    जऊन भक्त शरण परय, ले श्रद्धा विश्वास ।
    श्रीगणेश पूरन करय, ऊखर जम्मो आस ।।

          चौपाई
हे     गौरा  गौरी  के    लाला । हे  प्रभू  तै    दीन   दयाला
सबले पहिली तोला सुमरव । तोरे गुण गा के मै झुमरव ।।1।।

तही  तो  बुद्धि के देवइया । तही  प्रभू  दुख  के हरइया
वेद पुराण तोरे गुण गाय । तोर महिमा ल भारी बताय ।।2।।

धरती हे दाई अकास ददा । ऐ बात कहेव तू मन सदा
तोर बात ले गदगद भोला । बना दिहीस ग गणेश तोला ।।3।।

शुरू करय जऊन ह काम अपन । हे प्रभू ले के नाम जपन
जम्मो  के  होवय  काम  सफल । नई देवय कोनो विघ्न दखल ।।4।।

जइसन लम्बा सूड़ ह तोरे । लम्बा कर दव सोच ल मोरे
जइसन  भारी  पेट ह तोरे । गहरा कर दव सोच ल मोरे ।।5।।

गौरी    दुलार   भाथे    तोला । ओइसने  दुलार  दव  मोला
जस मिठ मोदक भाये तोला । मिठ मिठ भाखा दे दव मोला ।।6।।

हे एकदन्त एक  किरपा करहु । मोर बुद्धि ल कभ्भू झन हरहु
लेवव नाम ल संझा बिहनिया । काम पूरा होवय सब दुनिया ।।7।।

हे   मोर  आखर  के   देवता । गाड़ा  गाड़ा  तोला  न्योता
हे देव कुमति के नाश करव । प्रभू सुमति मोर भाल भरव ।।8।।

अपन पुरखा अऊ माटी के । अपन जंगल अऊ घाटी के
करवं मै निशदिन परनाम । सदा बने रहय ईखर मान ।।9।।

नारद शारद जस ला गावय । ‘रमेश‘ गवार का कहि सुनावय
हे   रिद्धी  सिद्धी   के    दाता । अब दुख मेटव भाग्य विधाता ।।10।।


दोहा-    जब जब भक्त शरण परय, मेटय सकल कलेष ।
             सुख देवय पिरा ल हरय, मोर मयारू गणेश ।।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

छत्तीसगढ़ी दोहा

छत्तीसगढ़ी दोहा


   हर भाखा के कुछु न कुछु, सस्ता महंगा दाम ।
   अपन दाम अतका रखव, आवय सबके काम ।।

   दुखवा के जर मोह हे , माया थांघा जान ।
   दुनिया माया मोह के, फांदा कस तै मान।।

   ये जिनगी कइसे बनय, ये कहूं बिखर जाय ।
   मन आसा विस्वास तो, बिगड़े काम बनाय ।।




....‘रमेश‘...

रविवार, 8 सितंबर 2013

हे गौरी के लाल


बुद्धि के देवइया अऊ पिरा के हरइया हे गज मुख  वाला ।
सबले पहिली तोला सुमिरव हे षंकर सुत गौरी के लाला ।।

वेद पुरान जम्मो तोरे च गुन ल गाय हे,
सबले पहिली श्रीगणेष कहव बताय हे ।
सभो देवता ले पहिली सुमिरन तोरे कहाये हे,
हे परभू मोरो अंतस ह तोरे च गुन ल गाये हे ।

शुरू करत हव तोर नाम ले, ये कारज गृह जंजाला,
हे गजानन दया करहू झन होवय कुछु गड़बड़ झाला । हे गौरी के लाला.........

जइसे लंबा लंबा सूड़ तोरे,
लंबा कर दव सोच ल मोरे ।
जइसन भारी पेट तोरे,
गहरा बना दव विचार ल मोरे ।

अपन माटी अऊ अपन पुरखा के सेवा गावंव ले सुर लय ताल ।
हे एकदन्त एक्केच किरपा करहू बुद्धि ले झन रहव मै कंगाल ।। हे गौरी के लाल.....

जइसे भाते उमा महेश के मया ह तोला,
ओइसने अपन मया दे दव मोला ।
मिठ मिठ लाडू जइसे भाते तोला,
ओइसने गुतुर गुतुर भाखा दे दव मोला ।

कुमति के नाश कर सुमति ले भर दौव मोरो भाल ।
हे आखर के देवता मोरो गीत ल लौव सम्हाल ।। हे गौरी के लाल............


दाई ल धरती ददा ल अकास कहिके कहाय गणेश,
तोर ये बुद्धि ल जम्मो देवता ले बड़का कहे हे महेश ।
तोरे च शरण आये नारद अऊ सब देवता संग सुरेश ,
हे दयावंत तुहरे शरण आये हे ये मुरख ‘रमेश‘ ।।

रिद्धी सिद्धी के दाता प्रभू सिंदुर सोहे तोर भाल ।
मोरो दुख मेटव हे गौरी के लाल, हे गौरी के लाल ।।

-रमेश चैहान

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

खुशी मनाओ भई आज खुशी मनाओं

भादो के महीना घटा छाये अंधियारी,
बड़ डरावना हे रात कारी कारी ।

कंस के कारागार बड़ रहिन पहेरेदार,
चारो कोती चमुन्दा हे खुल्ला नईये एकोद्वार ।

देवकी वासुदेव पुकारे हे दीनानाथ,
अब दुख सहावत नइये करलव सनाथ ।

एक एक करके छैय लइका मारे कंस,
सातवइया घला होगे कइसे अपभ्रंस ।

आठवईंया के हे बारी कइसे करव तइयारी,
ऐखरे बर होय हे आकाशवाणी हे खरारी ।

मन खिलखिवत हे फेर थोकिन डर्रावत हे,
कंस के काल हे के पहिली कस एखरो हाल हे ।

ओही समय चमके बिजली घटाटोप,
निचट अंधियारी के होगे ऊंहा लोप ।

बिजली अतका के जम्मो के आंखी कान मुंदागे,
दमकत बदन चमकत मुकुट चार हाथ वाले आगे ।

देवकी वासुदेव के हाथ गोड़ के बेड़ी फेकागे,
जम्मो पहरेदारमन ल बड़ जोर के निदं आगे ।

देखत हे देवकी वासुदेव त देखत रहिगे,
कतका सुघ्घर हे ओखर रूप मनोहर का कहिबे ।

चिटक भर म होइस परमपिता के ऊंहला भान,
नाना भांति ले करे लगिन ऊंखर यशोगान ।

तुहीमन सृष्टि के करइवा अव जम्मो जीव के देखइया अव,
धरती के भार हरइया अऊ जीवन नइया के खेवइया अव ।

मायापति माया देखाके होगे अंतरध्यान,
बालक रूप म प्रगटे आज तो भगवान ।

प्रगटे आज तो भगवान मंगल गाओं,
खुशी मनाओ भई आज खुशी मनाओं ।

..............‘‘रमेश‘‘............

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

धरे कलम गुनत हंव का लिखंव

धरे कलम गुनत हंव का लिखंव
लइकामन बर संस्कार के गीत लिखंव,
कचरा बिनईया लइकामन के चित्र खिचंव ।
कोनो कोनो लइका विडि़यो गेम खेलय,
कोनो कोनो लइका ठेला पेलय ।
कोनो कोनो कतका महंगा स्कूल म पढ़य,
कोनो कोनो बचपन म जवानी ल गढ़य ।
कोखरो कोखरो के संस्कार ल,
ददा दाई मन दे हे बिगाड़।
कोखरो कोखरो ददा दाई मन,
भीड़ा दे हे जिये के जुगाड़ ।
बड़ आंगाभारू लइकामन के संसार
ऐमा मै नई सकंव,
धरे कलम गुनत हंव अब का लिखंव ।

धरे कलम गुनत हंव का लिखंव
लिखथे सब मया मिरीत के बोल,
रखदंव महू अपन हिरदय ल खोल ।
करेन बिहाव तब ले मया करे ल जानेन,
ददा दाई कहिदेइस तेने ल अपन मानेन ।
अब तो बर न बिहाव देखावत हे दिल के ताव,
बाबू मन रंग रूप ल त नोनी मन धन दोगानी ल
देवत हे कइसन के भाव ।
जेन भाग के करे बिवाह तेखर मन के दशा ल विचार,
न ददा के न दाई के घिरर घिरर के जिये बर लाचार ।
बड़ आंगाभारू हे मया पिरित के संसार
ऐमा मै नई सकंव,
धरे कलम गुनत हंव अब का लिखंव ।

धरे कलम गुनत हंव का लिखंव
कतको झन लिखत हे नेतागिरी म व्यंग,
महू लिखतेव सोच के रहिगेव दंग ।
ऐ नेतामन कोन ऐ करिया अक्षर भईंस बरोबर,
जम्मो झन एके तरिया के चिखला ले हे सरोबर ।
चिनहावत नईये कोन काखर कोन काखर,
जम्मो झन दिखथें एक दूसर ले आगर ।
बड़ भोरहा हे ऐमा के रेंगई,
मै लगत हव बछरू लेवई ।
बड़ अंधियारी नेतागिरी के संसार
ऐमा मै नई सकंव,
धरे कलम गुनत हंव अब का लिखंव ।

धरे कलम गुनत हंव का लिखंव
देश भक्ति के गीत लिख के कतका झन होगे अमर,
महू गा लेतेंव अपन देश के दुश्मन संग हमर समर ।
देश के भीतर म आतंकवादी नक्सलवादीमन के हे भरमार,
कोनो मेरा कोनो ला मार देथे गम नई पावय सरकार ।
सीमा म चीन अऊ पाकीस्तान कइसे खड़े हे छाती तान,
सैनिक मन के घेंच ल उतारत हे नइये कोनो ल भान ।
जम्मोझन सुते हे देखत हे सपना,
हमर काम ल कोनो करही हमला का करना ।
बड़ा विचित्र हे हमार देश प्रेम दुलार
ऐमा मै नई सकंव,
धरे कलम गुनत हंव अब का लिखंव ।

धरे कलम गुनत हंव का लिखंव
लिखे के मोला काबर हे धुन सवार,
करत हव मै हर ऐमा तो अब विचार ।
तुलसी मीरा सूर कबीरा दादू नानक,
लिखिन साखी भक्ति पद मानस ।
कतको बड़े बड़े हवय अभो कलमकार,
जेखर कलम देवत सुघ्घर आकार ।
अइसन सूरजमन के आघू म जुगुनू नई बन सकंव,
धरे कलम गुनत हंव का  लिखंव ।।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

हरेली हे आज

हरेली के गाड़ा गाड़ा बधाई -

लइका सियान जुरमिल के खुशी मनाव हरेली हे आज ।
अब आही राखी तिजा पोरा अऊ जम्मो तिहार हो गे अगाज ।

चलव संगी धो आईय नागर कुदरा अऊ जम्मो औजार ।
बोवईय झर गे निदईय झर गे झर गे बिआसी के काज ।

हमर खेती बर देवता सरीखे नागर गैती हसिया,
इखर पूजा पाठ करके चढ़ाबो चिला रोटी के ताज ।

लिम के डारा ले पहटिया करत हे घर के सिंगार ।
लोहार बाबू खिला ले बनावत हे मुहाटी के साज ।।

ढाकत हे मुड़ी ल मछरी जाली ले गांव के मल्लार ।
ये छत्तीसगढ़ म हर तिहार के हे छत्तीस अंदाज ।।

बारी बखरी दिखय हरियर, हरियर दिखय खेत खार ।
चारो कोती हरियर देख के हमरो मन हरियर हे आज ।।

तरूवा के पानी गोड़इचा म आगे आज ।
माटी के सोंधी सोंधी महक के इही हे राज ।

गांव के अली गली म ईखला चिखला ।
चलव सजाबो गेडी के सुघ्घर साज ।।

जम्मो लइका जवान मचलहीं अब तो ,
बजा बजा के गेड़ी के चर चर आवाज ।।

चलो संगी खेली गेड़ी दउड अऊ खेली नरियर फेक,
जुर मिल के खेली मन रख के हरियर हरियर आज ।

................‘‘रमेश‘‘...........

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

गुड़ म माछी कस

दूध बेचईया गली गली रेंगय मदिरा बेचईया बइठे सजाये साज रे ।
बहुत झन ल ऐखर ले कोई मतलब नइये कोनो कोनो पूछय राज रे ।।

मोर गांव के मरार बारी के भाटा धरे बइठे रहिगे हाट म ।
परदेशिया कोचिया के कड़हा कोचरा भाटा बेचागे आज रे ।।

गाया गरूवा बर ठऊर नइये कहां बनाई गऊठान ।
गांव के जम्मो सरकारी परीया घेरे हे गिद्ध अऊ बाज रे ।

नेता  मन नेतेच ऐ फेर चमचा मन बन गेहे बाप रे ।
गांव के कोनो मनखे ल चिंता नइये कइसे होही काज रे ।

कोनो कोनो भ्रष्टाचारी होतीन त कोई  बात नही ।
गुड़ म माछी कस झुम गे हे जम्मो झन आज रे ।।

...........‘‘रमेश‘‘................

सोमवार, 15 जुलाई 2013

मोरो मन हरियर

तोर मया के छांवे म, गोरी मोरो मन हे हरियर ।
चंदा कस तोर बरन, देख मोरो मन हे हरियर ।।

करिया हिरा कस चुन्दी, पाटी पारे लगाये फुन्दी,
तोर खोपा के बगिया म, भवरा कस मन हे हरियर ।

तरिया म फूले कमल, ओइसने हे तोर नयन,
देख कमल सरोवर ल, गावय मोर मन ये हरियर ।

ओट तोर गुलाब के पंखुडी, करत हे महक झड़ी,
ये गुलागी महक म, झुमय मोरो मन हरियर ।

माथे के टिकली, टिमटिमात हे मोर अंतस भितरी,
ऐखर ऐ अंजोर म, दमकत हे मोर मन हरियर ।

कभू कान म झुमका, कभू येमा डोलय बाली,
विश्मामित्र के मेनका कस, डोलावय मोरो मन हरियर ।

कनिहा के करधनिया, अऊ गोडे के पैयजनिया,
बोलय छुम छुम छनानना, नाचय गावय मोर मन हरियर ।

कोयल कस गुतुर बोली, अऊ गुतुर गुतुर तोर ठिठोली,
बोली अऊ ठिठोली के, समुदर म गोता खावय मोर मन हरियर ।

तै कही सकथस मोला कुछु कुछु, तै तो मोरे सबे कुछु,
तोर बिना नई जानव काहीं कुछु मोर मन हरियर ।

..........‘‘रमेश‘‘.........................

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

सपना म तैं

देखत हव,
कब ले गोरी तोला,
आंखी पिरागे ।

काबर कहे,
आवत हव मै ह,
ले मुरझागे ।

हाथ के फूल,
संजोय रहेव मै,
बिहनीया के ।

होगे रे सांझ,
मन मीत आबे रे,
सपना म तैं ।

..‘‘रमेश‘‘....

शनिवार, 6 जुलाई 2013

अब का देखव

मोर मन ल इही ह भाये हे कोनो परी ल अब का देखव ।
ओखर सिरत ले मन गदगदाये हे सुरत ल अब का देखव ।।

जब ले जाने हव ओला अपन सुरता कहां हे मोला ..
मोर अंतस म होही समाय हे मुहाटी ल अब का देखव ।।

जइसे मोर छांव मोर संग रेंगथे सुटुर सुटुर.........
मोर मन करथे धुकुर धुकुर ओखर मन ल अब का देखव ।।

चंदा के संगे संग चांदनी चंदा ल देखे चकोर....
पतंगा के दिया संग जरई अपन जरई ल अब का देखव ।।

मोर मया ओखर बर ओखर मया मोर बर.
मया घुर गे जस शक्कर म पानी अपन पानी ल अब का देखव ।।

............‘‘रमेश‘‘.......................

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

मीठ -मीठ सुरता


ये मीठ -मीठ सुरता, नई बनतये कुछु कहासी रे ।
कभू कभू आथे मोला हासी, कभू आथे रोवासी रे ।।

दाई के कोरा, गोरस पियेव अचरा के ओरा ।
कइसन  अब मोला आवत हे खिलखिलासी रे ।।

दाई  के मया, पाये पाये खेलाय खवाय ।
अपन हाथ ले बोरे अऊ बासी रे ।।

दाई ल छोड़के, नई भाइस मोला कहूं जवासी रे ।
लगत रहिस येही मथुरा अऊ येही काषी रे ।।

ददा के अंगरी, धर के रेंगेंव जस ठेंगड़ी ।
गिरत अपटत देख ददा के छुटे हासी रे ।।

ददा कभू बनय घोड़ा-घोड़ी , कभू करय हसी ठिठोली ।
कभू कभू संग म खेलय भौरा बाटी रे ।।

कभू कभू ददा खिसयावय कभू दाई देवय गारी रे ।
करेव गलती अब सुरता म आथे रोवासी रे ।।

निगोटिया संगी, संग चलय जस पवन सतरंगी ।
पानी संग पानी बन खेलेन माटी संग माटी रे ।।

आनी बानी के खेल खेलेन कभू बने बने त कभू कभू झगरेन ।
कभू बोलन कभू कभू अनबोलना रह करेन ठिठोली रे ।।

ओ लइकापन के सुरता अब तो मोला आथे मिठ मिठ हासी रे ।
गय जमाना लउटय नही सोच के आवत हे रोवासी रे ।।
.-रमेशकुमार सिंह चैहान

मंगलवार, 18 जून 2013

छत्तीसगढ़ी



अरे पगली,
मै होगेव पगला,
तोर मया म ।

तोर सुरता,
निंद भूख हरागे,
मया म तोर ।

रात के चंदा,
चांदनी ल देखव,
एकटक रे ।

कब होही रे,
मया संग मिलाप ,
गुनत हव ।

मया नई हे,
गोरी के अंतस म,
सुर्रत हव ।

एक नजर,
देख तो मोरो कोती,
मया के संगी ।


....‘रमेश‘...

शनिवार, 15 जून 2013

मिलईया हे मोला पगार

गुतुर गुतुर भाखा बोलय,
अंतस म मधुरस घोलय,
मोर सुवारी करे सिंगार,
मिलईया हे मोला पगार ।

कईसे लगहूं जी कहू होही,
कान म खिनवा, कनिहा म करधनिया,
अऊ गर म होही सोनहा हार,
मिलईया हे मोला पगार ।

फलनिया ह बनवाय हे,
मोरो मन ललचाय हे,
पूरा कर दौ ना जी मोरो साध,
होही तुहार बड़ उपकार,
मिलईया हे मोला पगार ।

ददा गो कापी पेन सिरागे हे,
स्कूल के फिस ह आगे हे,
लइकामन करत हे पुकार,
मिलईया हे मोला पगार ।

मोर स्कूल बस्ता ह चिरागे हे,
पेंट कुरता ह जुन्नागे हे,
लइकामन करत हे मनुहार,
मिलईया हे मोला पगार ।

रंधनही कुरीया ह चिल्लावत हे,
घेरी घेरी चेतावत हे,
सिरागे हे चाऊर दार,
मिलईया हे मोला पगार ।

पाछू महिना बड़ सधायेंव,
अपन बर मोटर साइकिल ले आयेंव,
दुवारी म खड़े हे लगवार,
मिलईया हे मोला पगार ।

का करव कइसे करव कहिके गुनत हव,
अपने माथा ल अपने हाथ म धुनत हव,
काबर एतके तनखा देते सरकार,
मिलईया हे मोला पगार ।
.......‘‘रमेश‘‘...........

सोमवार, 3 जून 2013

अब कहां लुकागे


मया प्रित के बोली,
तोर हसी अऊ ठिठोली,
अब कहां लुकागे.........
तोला देखे के बड़ साध,
ओधा बेधा ले रहंव मै ताक,
ओ तकई,
अब कहां लुकागे ..........
कनेखी आंखी ले तोर देखई,
संग म सुघ्घर तोर मुच मुचई,
ओ मुच मुचई,
अब कहां लुकागे ........
ओ छुप छुप के मिलई
मया मा  खिलखिलई,
ओ खिलखिलई
अब कहां लुकागे.........
तोर संग जीना अऊ संग मरना,
तोर संग रेंगना अऊ संग घुमना,
ओ घुमई ,
अब कहां लुकागे............
तोर रूठना
मोर मनाना
ओ मनई
अब कहां लुकागे.........
बिहाव करे हन के पाप
का ये होगे हे अभिषाप,
हाय रे रात दिन के कमई
 ओ दिन
अब कहां लुकागे.......
लइका मन गे हे बाढ़,
चिंता मुड़ी म गे हे माढ
लइकामन संग खेलई,
अब कहां लुकागे..................
लइका मन ल पढ़ाना हे लिखाना हे,
जिनगी ल जिये बेर कुछु बनाना हे,
हमर बनई,
अब कहां लुकागे ...............
जिये बर जियत हन,
मया घला करत हन
चिंता म चिचीयावत हन,
अपन गीत कहां गावत हन,
हमर मया प्रित के गीत,
ओ गुनगुनई,
अब कहां लुकागे.......

बुधवार, 29 मई 2013

हम

हमरो खुशी अब नइये कोखरो ले कम ।
अपने हाथ म अपने भाग संवारत हन हम ।।

काही बात के कमी नईये मेहनत घला नईये कम,
पथरा म पानी ओगरत जंगल घला संवारत हन हम ।
खेती के रकबा भले पहिली ले होगे हे कम,
फेर आगू ले ज्यादा फसल उगावत हन हम ।।

पढ़ईयांमन के कमी नइये गुरूजीमन घला नईये कम,
हाथ ले हाथ जोरीके षिक्षा के दिया जलावत हन हम ।
करिया अक्षर भईस बरोबर कहइय अब होगे हे कम,
आखर आखर जोड़ के पोथी पतरा बनावत हन हम ।।

 षहर बर सड़क के कमी नइये गांव बर रद्दा नईये कम,
गांव ल घला शहर संग जोर के शहर बनावत हन हम ।
जंगल पहाड़ के रहईयामन के जिनगी म खुशी कहां हे कम,
जंगल-झांड़ी पहाड़-खाई सबो मिलके गीत गांवत हन हम ।।

हमर विकास म कमी नईये फेर जलनहा मन कहां हे कम,
चारो कोती नक्सवाद के आगी तेमा जर भुंजावत हन हम ।
ऊखर मेर बंदूक गोली के कमी नईये बारूद घला नईये कम,
जेनेला पावत हे मार गिरावत हे आंसू बहावत हन हम ।।

ऊखर पाप मा कमी नइये पापीमन नई होवत हे कम,
अपन ल हमर हितैशी बतावय अऊ बहकत हन हम ।
ताने बंदूक नगरा नाचत ये आतंक ह नई होवय कम,
जब तक जुर मिलके दृढ़ इच्छा षक्ति नई जगाबो हम ।।

काबर हे

काबर हे
मोर हरियर भुईया के रंग, लाल होवत काबर हे ।
मोर सोनचिरईयां कस ये धरती, रोवत काबर हे ।।

हमर मन के विकास इखर आंखी म गड़त काबर हे ।
जब पाथे तब ऐमन लाल सलाम देवत काबर हे ।

का इखर तरक्की के सोच हमर ले आगर हे ।
त तरक्की के रद्दा छोड बंदूक धरे काबर हे ।

जंगल के संगी निच्चट भोला-भाला शांति के सागर हे ।
तेखरमन के मन म अशांति के बीजा बोवत काबर हे ।

जंगली के पक्का हितैशी अपन ल देखावत काबर हे ।
बंदूक के छांव म घिरार घिरार के जियावत काबर हे ।

लोकतंत्र के देश म अपन तानाशाही चलावत काबर हे ।
लोकतंत्र के रखवार ल मौत के घाट उतारत काबर हे ।

हिम्मत हे त आगू म आके हाथ दू चार करय,
ओधा बेधा पाछू ले झगरा ल चलावत काबर हे ।

भोला भाला जनता, लाचार करमचारी जवान नेता,
कोखरो होय बलिदान अबतक बेकार होवत काबर हे ।

जब कंधा ले कंधा मिलाके के हमला चलना हे,
त हमार ये नेता मन अपनेच म लड़त काबर हे ।

अइसन अत्याचारी मन ल कोनो मन भोभरावत काबर हे ।
हमर देश के सरकार अपन इच्छाशक्ति ल लुकावत काबर हे ।

मोर धान के कटोरा म ऐमन खून भरत काबर हे ।
मोर भुईंया के मनखे मन बेखबर  सोवत काबर हे ।

सांझ


.बेरा ऐती न  ओती बेरा बुडत रहीस,
करिया रंग बादर ले सुघ्घर उतरत रहिस,
वो सांझ, सुघ्घर परी असन,
धीरे धीरे धीरे...............
बुड़ती म, फेर कोनो मेर नईये चंचलता के आभास,
ओखर दुनो होट ले टपकत हे मधुरस,
फेर कतका हे गंभीर .... न हसी न ठिठोली,
हंसत  हे त एकेठन तारा,
करीया करीया चूंददी म ,
संझारानी के मांग संवारत।
..........रमेश........

शुक्रवार, 24 मई 2013

आसो के घाम


आगी के अंगरा कस दहकत हे आसो के घाम,
अब ए जीवरा ल, अब ए जीवरा ल कहां-कहां लुकान ।

झुलसत हे तन, अऊ तड़पत हे मन,
बिजली खेलय आंख मिचोली अब कइसे करी जतन ।
बिन पानी के मछरी कस तड़पत हे बदन,
पेट के खतीर कुछु न कुछु करे ल पड़ते काम ।। आगी के अंगरा कस ......

धरती के जम्मो पानी अटावत हे,
जम्मो रूख राई के पाना ह लेसावत हे ।
लहक लहक लहकत हे गाय गरूवां अऊ कुकुर,
चिरई चिरगुन बईठे अब कउन ठांव ।। आगी के अंगरा कस ........

अब तो महंगाई सुरसा कस मुंह ल बढ़ावत हे,
ये महंगाई अइसन घाम ले घला जादा जनावत है।
घिरर घिरर के खिचत हन ये जिनगी के गाड़ी,
अब कहां मिलय हमन शांति सुकुन के छांव ।। आगी के अंगरा कस ........
................रमेश..............................

जय हो दारू

 
ऐती ओती चारो कोती एकेच जयकारा हे ।
जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू।।

कोनो कहय ये नवा जमाना के चलन हे,
त कोनो कोनो कहय ये काम हे शैतानी ।
आज के मनखे तोर संग करे हे मितानी ,
लइका सीयान या होय जवान सबो हे तोर मयारू ।। जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू

दूघ गली गली बेचाये हे,
तभो ऐला कहां कोनो भाये हे ।
तोला पाये बर मनखे अपन थारी लोटा ल मड़ाय हे,
ऐखरी सेती करम ल ठठाय हे, घर के मेहरारू ।। जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू

तोर ठौर ल मिले हे मंदिर के सानी,
गीरा गंभीर हे तोर भगत मन के कहानी ।
तोर भगत सुत उठ के तोरे दरस ल पाथे,
बिहनिया, मझनिया,अऊ संझा तीनों बेर हाजरी लगाथे ।
तभो ले तोर भक्तन मन तोला पाय बर अऊ अऊ ललचाथे,
तोर भगत मन के भगती ह हवय चारू-चारू ।। जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू

कोनो कोनो भगतन अपन घर-कुरीया घला चढ़ाये हे,
कोनो कोनो दुरपती कस अपन बाई ल दाव म लगाये हे ।
लइका बच्चा के घला ओला चिंता कहां सताये हे,
तभे तो जम्मा घर के जिनीस वो ह बेच खाये हे ।
अब तो वो तोर दुवारी म लगावत हे झाडू ।। जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू

तोर भगती म कुछ भगतन एइसे समाधी लगाये हे,
मनखे ल कोन कहय कुकुरमन घला पानी चढ़ाये हे ।
ईखर आन बान अऊ षान भोले बाबा ले कहां कम हे,
चिखला, घुरूवा, कचरा ईखर बर फुल आसन सम हे ।
कहत हे ‘रमेश‘ अऊ जम्मो भगतन मन देवत हे हुकारू ।। जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू


गुरुवार, 23 मई 2013

कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय

                       कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय
(श्री हरिवंशराय बच्चन की अमर कृति ‘‘कोशिश करने वालो की हार नही होती‘‘ का अनुवाद)

लहरा ले डरराये  म डोंगा पार नई होवय,
कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय ।
नान्हे नान्हे चिटीमन जब दाना लेके चलते,
एक बार ल कोन कहिस घेरी घेरी गिरते तभो सम्हलते ।
मन चंगा त कठौती म गंगा, मन के जिते जित हे मन के हारे हार,
मन कहू हरियर हे तौ का गिरना अऊ का चढना कोन करथे परवाह ।

कइसनो होय ओखर मेहनत बेकार नई होवय,
कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय ।

डुबकी समुददर म  गोताखोर ह लगाथे,
फेर फेर डुबथे फेर फेर खोजथ खालीच हाथ आथे ।
अतका सहज कहां हे मोती खोजना  गहरा पानी म,
बढथे तभो ले उत्साह ह दुगुना दुगुना ऐही हरानी म ।

मुठठी हरबार ओखर खाली नई होवय,
कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय ।

नकामी घला एक चुनौती हे ऐला तै मान,
का कमी रहिगे, का गलती होगे तेनला तै जान ।
जब तक न होबो सफल आराम हराम हे,
संघर्ष ले झन भागव ऐही चारो धाम हे ।
कुछु करे बिना कभू जय जयकार नई होवय,
कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय ।

.................‘‘रमेश‘‘.....................

आसो के होरी म

                         आसो के होरी म
   
    आसो के होरी म, मोरो मन  हे हरियर ।
    मोरो  मन के, प्रित के रंग  हे गोरियर ।

    गोरी के गाले ल, आज करिहव पिरीयर ।
    मया प्रित के, गोठ हेरिहव आज फरियर ।

    तै मोर राधा गोई, मै तोर श्याम करियर ।
    तही मोर करेजा गोई, मै तोर धड़कन बर ।

    तोर बीना जोही मोर, जिनगी हवय करियर ।
    मया के होरी म, बन जई गोरी जावरजियर ।

    ...................‘‘रमेश‘‘.........................

-ःःमेघा काबर छाय हेःः-



    माघ के उतरति म अऊ बेरा के बूडती म,
    मेघा काबर छाय हे ये बसंत बर काबर मंतियायें  हे ।

    लूहूर तूहूर अपन बिदाई म आसू  बहावत हे,
    सुरूर सुरूर पुरवाही ओखर साथ निभावत हे ।

    अभी बरफ ह बरोबर टघले नईये,
    ओला ये फेर काबर जमाय है ।

    अभी अभी लइका के दाई सेटर ल संदूक म धरे हे,
    तेला ये बादर रोगहा फेर निलकलवाये बर परे हे ।

    ओनाहारी अभीच्चे फूल धरे हे तेंला ये काबर झर्राय हे ।
    सुघ्घर सपना देखत किसान ल हिलोर के काबर जगायें है।
   
    सावन भादों जब ऐखर जरूरत रहिस त अब्बड़ तरसाये हे ।
    आज चनामन के माते हे फूल तेन ल झर्रायेबर आये हे ।

    जइसे गांव के गौटिया काम म पइसा नई देवय,
    अऊ अपन काम बर फोकट म दारू पियाये हे ।

    ये बादर काम बर ठेंगा देखायें हे,
    अऊ आज फोकट के बरसाय हे ।
    ...................‘‘रमेश‘‘.........................

नान्हेपन म

नान्हेपन म ममादाई अब्बड किस्सा सुनावय,
रात रात जाग के ओ ह हमला मनावय ।

कभु सुनावय किस्सा भोले बबा के नादानी,
कभु सुनावय राजा रानी के सुघ्घर कहानी ।

कभु सुनावय कइसे ढेला पथरा निभाईन मितानी,
कभु सुनावय भूत प्रेत अऊ राक्षस मन के शैतानी ।

ओखर हर किस्सा हमर आंखी म नवा चमक लावय,
दाई ऊंघावत ऊंघावत हमला नवा किस्सा सुनावय ।

ओ जमाना म कहा टी.वी. अऊ सिनेमा के परदा,
तब तो रहिस किस्सा अऊ नाचा पइखन के जादा दरजा ।

न चमक न दमक तभो अच्छा लगय हमर मन,
आज चारो कोती के चमक दमक घलो उदास हे मोरो मन ।
.................‘‘रमेश‘‘.......................

बुधवार, 22 मई 2013

//कोनो काही कहय //

कोनो प्रतिभा गुलाम नई होवय अमीरी के,
रददा रोक नइ सकय कांटा गरीबी के ।
कोनो काही कहय चिखले म कमलदल ह खिलथे,
अऊ हर तकलीफ ले जुझेच म सफलता ह मिलथे ।

हर खुशी कहां मिलथे अमीरी ले,
कोनो खुशी कहां अटकथे गरीबी ले ।
कोनो काही कहय खुशी तो मनेच ले मिलथे,
तभे तो मन चंगा त कठौति म गंगा कहिथे ।

सुरूज निकलथे दुनो बर,
पुरवाही बहिथे दुनो बर ।
कोनो काही कहय बरसा घाम दुनो बर बरिसथे,
जेखर जतका बर गागर ओतके पानी भरथे ।

अमीर सदा अमीर नई रहय
गरीब सदा गरीबी नई सहय ।
कोनो काही कहय भाग करम के गुलाम रहिथे ।
सियान मन धन दोगानी ला हाथ के मइल कहिथे ।

सफल होय बर हिम्मत के दरकार हे,
जेन सहय आंच तेन खाय पांच कहाय हे ।
कोनो काही कहय जांगर टोर जेन कमाथे,
अपन मुठ्ठी म करम किस्मत ल पाथे ।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

जइसन ल तइसन

              

जइसन ल तइसनहम कहिथन कइसन,
फेर लगते हे हमार सरकार ल नई भावय अइसन ।

    कोनो हमर मुडी काटय,
    अऊ हमन देखन कऊवां कुकुर असन,
    भुकत हन ये तुहरे करे, ये तुहरे करे
    फेर दुश्मन चलत हे हाथी असन ।

बहुत होगे अब चाबे नइ सकत त एक  बेर तो फुफकार,
कही दे एक  बेर सौ सुनार के त एक  बेर लुहार ।

    अभी कुछु नई कर सकेन त
    हमार पिढी ला का सिखाबो,
    दुश्मन काटे मुडी दु चार त
    एक एक करके हमन मुडी ल दताबो ।
................‘‘रमेश‘‘........................

बिचार

     
1. कोनो काम छोटे बड़े नई होवय,
जऊन काम म मन लगय ओही काम करव ।
बघवा कइसे छोटे बड़े शिकार म ध्यान लगाये हे,
ऐमा जरूर विचार करव ।।

2. सिखे के कहू ललक होही,
मनखे कोनो मेर ले रद्दा खोज लेही ।
भवरा जइसे फूल ऊपर होही,
त मधु मधु मधुर परागेच ल पिही ।।

3. भगवान चंदन के फर फूर कहां बनाये हे,
तभो चारो कोती खुशी बगराये हे ।
इही त्याग अऊ तपस्या ले,
भगवान ऐला अपन माथे म चढ़ाय हे ।।

4. सज्जन पुरूष ओइसने होथे, जइसे होथे रूख ।
ठाड़हे च रहिथे चाहे बारीश होवय के धूप ।।
दूसरेच बर फरथे अऊ फूलथे,
चाहे जिनगी जावय सूख ।।

5. बगुला कइसे ध्यान लगाये हे,
जम्मो इंद्रिल अपन काम म लाये हे ।
अइसने जऊन मनखे अपन काम म मन लगाये हे,
जम्मो सुख ल पाये हे ।।



6. जेन करम के करे म  बडे ल नई दे सकय दोस ।
  उही करम ल छोटे के करे म उतार देही रोस ।।

7. मुह ले निकले हर भाखा कोई न कोई बात होथे,
  कोनो फूलवा के महक त कोनो दिल म  अघात होथे ।

8. मोह जम्मो दुख के जर म हे, माया मन हे थांगा म ।
  लालच म जेने  आये हे, तेने च ह फसे हे फांदा म ।।


.............‘‘रमेश‘‘........................

विदेशी सिक्षा



 सिक्षा सिक्षा ये विदेशी सिक्षा से का होय ।
 न कौढी के न काम के घुम घुम के बदनाम होय ।।

 न ओला पुरखा के मान हे न देश धरम के ज्ञान ।
 विदेसी सिक्षा लेवत हे अऊ विदेसी संस्कृति के अभिमान ।।

 दाई-ददा मोर लईका पढथ हे कहिके नई कराव कुछु काम ।
 नान्हेपन ले जांगर नई चलाय हे अब कोन जांगर ले होही काम ।।

 पूजा-पाठ, कथा-भागवत सब ल देवत हे अंधविश्वास के नाम ।
 लईका पढिस लिखिस  अऊ होगें कइसन ओ हर विदवान ।।

पागे कहु नौकरी चाकरी त होगे परदेशिया नई आवय कुछु काम
 न पाइंच कहु काम धाम त परबुधिया होके होवथ हे बदनाम ।।

गांव-गांव अऊ गली-गली नेता अऊ ऊखर चम्मच के भरमार हे
 जेन कहावय भाई-दादा जेखर करम ले ये देश शरमसार हे ।।

 सिरतुन कहव चाहे कोनो गारी देवव के गल्ला ।
 इंकरे आये ले होवत हे भ्रष्टाचार के अतका हल्ला ।।
................‘‘रमेश‘‘........................

मंगलवार, 21 मई 2013

मोर मईया के जगराता हे

आगे आगे नवरात्रि तिहार, सब मिल के करव जयजय कार ।
मंदिर मंदिर दाई करत हे बिहार, मोर मईया के जगराता हे ।

कोनो जलाव जोत मनौती, त कोनो करावय पूजा पाठ ।
कोनो गावय जसगीत मनोहर, त कोनो लेवय साट ।
भक्तन मन करत हे गोहार, मोर मईया के जगराता हे ।

कोनो हवय निर्जला उपास, त कोनो लेवय फरहार ।
कोनो साधय जतंर मंतर, त कोनो करय करिया करंजस ।
भक्तन मन के हवय नाना प्रकार, मोर मईया के जगराता हे ।

कोनो जावय माॅ के पहाडि़या, त कोनो बोवय घर म फुलवरिया ।
कोनो चढ़ाव धजा नरियर, त कोनो लावय फूल लाली पिरियर ।
कोनो चढ़ाव मईया ल सिंगार, मोर मईया के जगराता हे ।

कोनो मांगय धन दोगनी, त कोनो मांगय काम म बरकत महारानी ।
कोनो मांगय आद औलाद, भक्तन मन के हे नाना फरियाद ।
कोनो चाहय केवल भक्ति तुहार, मोर मईया के जगराता हे ।
....................‘‘रमेश‘‘..........................

-ः मोर छत्तीसगढ के सुघ्घर गांव:ः-

जिहां चिरई-चिरगुन करे चांव-चांव,
जिहां कऊंवा मन करें कांव-कांव ।
जिहां कोलिहा-कुकुर मन करे हांव-हांव,
ऊंहें बस्ते मोर छत्तीसगढ के सुघ्घर गांव ।

गाय बछरू कुकरा कुकरी अऊ छेरी पठरू,
घर घर नरियावय मिमीयावय कुकरू कू कुकरू ।
दूध दूहे बर बइठे पहटिया दोहनी धरे उघरू,
गाय चाटय पूछी उठाय दूघ पियत हे बछरू ।
बारी बखरी म बंधय कोनो रूखवा के छांव,
ऊंहें बस्ते मोर छत्तीसगढ के सुघ्घर गांव ।


बाबूमन खेलय बाटी ईब्बा, नोनी मन खेलय फुग्गडी,
कोनो खेलय तास चैसर त कोनो करय चारी-चुगली ।
पनिहारिन म करय हंसी ठिठोली मुडी म बोहें गगरी ,
जिहां के घर संग भावय परछी अंगना म लहरावय तुलसी ।
जिहां तुलसी के कतका मान , जेखर कतका सुघ्घर छांव,
ऊंहें बस्ते मोर छत्तीसगढ के सुघ्घर गांव ।

गोरसी धरे बईठे बबा नातीमन ल धरे बुढ़ही दाई,
नागर जोते ल गे हे ददा कांदी लुये बर दाई ।
चैपाल म बईठे पंच पटइल अऊ गौटिया,
संग म बईठे पंडित बाबू जेखर हे चुटिया ।
गौतरिहा मन बैईठे सुघ्धर आमा के छांव,
ऊंहें बस्ते मोर छत्तीसगढ के सुघ्घर गांव ।

मया म गावय करमा ददरिया, लइका होंय  म गावय सोहर,
बिहाव म गावय भडौनी गीत, संग छोडवनी मांगय मोहर ।
जिहां उत्तीय म बिराजे सढहादेव, त बुडतीय म महामाई,
जिहां ठाकुर देव बिराजे सौहवे, जऊन करय सदा सहाई ।
देवी देवता मन हा गा बिराजे संगी जिहां हर ठांव,
ऊंहें बस्ते मोर छत्तीसगढ के सुघ्घर गांव ।

माटी मा


लईकापन म खूब खेलव खायें अऊ सनाय ऐव माटी मा ।
माटी के पुतरा पुतरी बनाएंेव घरघुंदिया खेलेव धुर्रा माटी मा ।।

जवानी म खूब,जांगर टोर कमाऐंव मिल के माटी मा ।
माटी के भिथिया, माटी के खपरा छबना छबवाऐव माटी मा ।।

सुघ्घर सुघ्घर अपन घर कुरीया संवारेऐव माटी मा ।
खुब दुनियादारी निभऐंव, खुब गुलछर्रा उडा ऐव माटी मा ।।

बुढापा सवामवत हे , कांपत हाथ गोड नई माढत हे माटी मा ।
खांसी खखांर सतावत हे, ऐला लुकावत हव इही माटी मा ।।

जवानीपन के सब सबसंगी छूट गेय, नाती मन खेलत हे माटी मा।
मोरो कोनो सगा संगी नईये, अक्केला आंखी गडांऐव हव माटी मा ।।

अब सास फूलत हे, जीये के आस नइये, समाये के मन हे माटी मा ।
अब मोला खटिया उतार के भुईया लिप के सोवा देहू माटी मा ।।
 ..................‘‘रमेश‘‘................................

हे जगत जननी महामाई


हे जगत जननी महामाई, सदा रहव सहाई ।
मैं तोर नान्हे नादान लईका, अऊ तही मोर दाई ।

तोरेच किरपा म ये जिंनगी पाय हव ।
तोहीच ल अपन मन मंदिर म बसाय हव ।

श्रद्धा के फूल मईया तोला मै चढ़ाय हव ।
विश्वास के दिया मईया मै ह जलाय हव ।

तोरेच आशीषले ये दुनिया हे सुहाई ।
हे जगत जननी महामाई, सदा रहव सहाई ।

जब ले होश सम्हालेव तब ले तोला जानेव ।
जिनगी के जम्मो दुख ल तोरे चैखट म लानेव ।

तोर नाम के सिवाय पूजा पाठ मैं नई जानेव ।

चंचल मन अऊ चंचल तन ऐला कहा सम्हालेव ।
 क्षमा करिहव मोर जम्मो अपराध बिसराई ।

 हे जगत जननी महामाई, सदा रहव सहाई ।
हे जगत जननी महामाई, सदा रहव सहाई । 
 ...............रमेश...............

बचपना तो बचपना ये

आज मोर लइका दिन  भर, विडियो गेम म बिपतियाय हे,
पढत न लिखत देख ओला, मोरो दिमाग ह मंतियाय हे ।

गुस्सा म ओला का कहव, का नई कहव कहिके गुनत हंव,
लइका के दाई हर लईका ले, देवत हे गारी तेला सुनत हंव।
गुनत गुनत मोर दिमाक म, मोरे बचपना के धुंधरा छाय हे,
अऊ लइका बने के साध ले,एक बार फेर मोरो मन हरियाय हे ।।

संतोश मन संग बांटी खेलंव, नेतू मन संग ईब्बा ,
सब लईका मिल के खेलेन, छु-छुवाल छिप्पा ।
नरवा मा पूरा आये हे, तऊंरे बर रवि राकेष ह बुलाये हे,
मोरो मन ह ललचाय हे, फेर मोरो दाई ह मंतियाय हे ।।
      
तऊडे के बड साध , ओधा बेधा ले मैं गेंव भाग ,
पडहेना आगे राकेश के हाथ, होगे आज के साग ।
कूद -कूद  के खेलई अऊ कूद कूद के तवरईय ,
संगी मन के मोर घर अऊ, मोर उखर घर जवईय ।
बचपना तो बचपना ये, खेलई म अऊ सुघराये हे
ऐही सोच सोच अब मोरो मन बने हरियाये हे ।।

    रूपेश गनपत मोर स्कूल के संगी
    पढ़े म नई करेन हम एको तंगी
    हमू खेल कूद के पढ़े हन
    अपन जिंनगी ला गढ़े हन
बेटा मानव मोरो कहना, खेलव कूदव खोर अंगना
तन मन बने रहिहीं, फेर पढ़व घला संगे संग ना
बात मान के मोरो लइका, पुस्तक मा आंखी गड़ाय हे
बात सुन के मोरे सुवारी, जोरे से खिलखिलाय हे

अब जमाना ह बदल गेहे बाबू ..........

सुरता आवत हे मोला एक बात के,
बबा ह मोर ले कहे रहिस हे एक रात के ।
का मजा आवत रहिस हे आगू,
अब जमाना ह बदल गेहे बाबू ।

अब कदर कहां हे दीन ईमान के,
अब किमत कहां हे जुबान के ।
अब कहां छोटे बड़े के मान हे,
ऐखर मान होत रहिस हे आगू ।। अब जमाना ह बदल गेहे बाबू ....

कोनो ल कोनो घेपय नही,
कोनो ल कोनो टोकय नही ।
जेखर मन म जइसे आत हे,
ओइसने करत जात हे ।
माथा धर के मंय गुनत हंव
अब का होही आगू ।। अब जमाना ह बदल गेहे बाबू .........
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नान्हेपन म होत रहिस हे बिहाव तेन कुरिती होगे,
बाढे़ बाढ़े नोनी बाबू उडावत हे
गुलछर्रा तेने रिति होगे ।
परिवार नियोजन के अब्बड़ अकन साधन,
अब कुवारी कुवारा ल कइसे करके बांधन ।
मुॅह अब सफेद होवय न करिया,
मुॅह करिया होत रहिस हे आगू ।। अब जमाना ह बदल गेहे बाबू .........

बलात्कारीमन ग्वालीन किरा कस सिगबिगावत हे,
कोन जवान त कोन कोरा के लइका चिन्ह नई पावत हे ।
सरकार आनी बानी के कानून बनावते हे,
तभो ऐमन एक्को नइ डर्रावत हे ।
संस्कार ले खसले म नई सुझय आगू पाछू ।। अब जमाना ह बदल गेहे बाबू ....

कानून के डंडा ले संस्कार नई आवय,
विदेशी संस्कृति ह नगरा नाच नचावय ।
लोक लाज शरम हया ला मनखे बिसरागेंहे
कुक्कुर माकर जइसे अब तो बउरागें हे ।
राम जानय अब का होही आगू । अब जमाना ह बदल गेहे बाबू ........

भगुवां बाना साजे साधु घुमय,
साधु मनखे अपन माथा धुनय ।
बालब्रह्मचारी के कोरी कोरी लईका
धरम करम के टूटत हे फईका
तन ले नही मन ले होना चाही साधु ।। अब जमाना ह बदल गेहे बाबू ........


सोमवार, 20 मई 2013

आवत हे चुनाव...........

आवत हे चुनाव

आवत हे चुनाव नेतामन अब आही हमर गांव ।
कऊवा कुकुरमन कस अब करही कांव-कांव ।।

गांव-गांव अऊ गली-गली, उखर बेनर पोस्टर पटही,
लिपे पोते हमर दीवार ह, उखर झूठा नारा ले पुतही ।
जस जादूगर बसुरी बजा के, मुंदथे हमर आंखी कान,
आश्‍वासन के झुनझुना धराके, कइसे बनाथे गा ठांव ।। आवत हे चुनाव.........

नवा नवा सपना सजा के कहय, करीहव तुहार काम,
तुहीमन हमर दाई ददा अऊ तुहीमन  चारो धाम ।
तुहरे किरपा ले करत हव, तुहरे सेवा के काम,
गुतुर गुतुर गोठ गोठियाही अऊ परही गा पांव ।। आवत हे चुनाव.........

घर-घर जाही अऊ जइसे देवता तइसे मनाही,
कइसनो करके ओमन हमन ल तो गा रिझाही ।
दाई माईमन बर बिछीया खिनवा, सुघ्घर लुगरा
ददा भाईमन बर बाटय गा दारू पाव-पाव ।। आवत हे चुनाव.........

साम-दाम, दण्ड भेद के जम्मो नियम ल अजमाही,
जात-पात, धरम-करम क्षेत्रवाद के आगी लगाही ।
विकास के गोठ गोठिया के, आंखी म सपना सजाहीं,
अऊ जुवारी कस लगाही अपन गा जम्मो दांव ।। आवत हे चुनाव.........

जइसे बोहू तइसे पाहू तुहीमन तो अडबड कहिथव,
फेर अइसन लबरा मनला, लालच मा काबर चुनथव ।
हमर गांव के चतुर सियान, लगावव थोकिन ध्यान ।
अइसने मा हमन ल कहां मिलही शांति के छांव ।। आवत हे चुनाव.........