मंगलवार, 7 नवंबर 2017

ये गांव ए (मधुमालती छंद)

सुन गोठ ला, ये गांव के। ये देश के, आें ठांव के
जे देश के, अभिमान हे । संस्कार के पहिचान हे

परिवार कस, सब संग मा, हर बात मा, हर रंग मा
बड़ छोट सब, हा एक हे । हर आदमी, बड़ नेक हे

दुख आन के, जब देखथें । निज जान के, सब भोगथे
जब देखथे, सुख आन के । तब नाचथे, ओ तान के

हर रीत ला, सब जानथें । मिल संग मा, सब मानथें
हर पर्व के, हर ढंग ला । रग राखथे, हर रंग ला

ओ खेत मा, अउ खार मा । ओ मेढ़ मा, अउ पार मा
बस काम ला, ओ जानथे । भगवान कस, तो मानथे

संबंध ला, सब बांध के । अउ प्रीत ला, तो छांद के
निक बात ला, सब मानथे । सब नीत ला, भल जानथे

चल खेत मा, ये बेटवा । मत घूम तैं, बन लेठवा
कह बाप हा, धर हाथ ला । तैं छोड़ झन, गा साथ ला

ये देश के, बड़ शान हे । जेखर इहां तो मान हे
ये गांव ए, ये गांव ए । ए स्वर्ग ले, निक ठांव ए

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

हे काम पूजा

तैं बात सुन्ना । अउ बने गुन्ना
जी भर कमाना । भर पेट खाना

ये पूट पूजा । ना करे दूजा
जीनगी जीबे । जब काम पीबे

बिन काम जोही । का तोर होही
हे पेट खाली । ना बजे ताली

ये एक बीता । हे रोज रीता
तैं भरे पाबे । जब तैं कमाबे

परिवार ठाढ़े । अउ बुता बाढ़े
ना हाथ पैसा । परिवार कैसा

जब जनम पाये । दूधे अघाये
जब गोड़ पाये । तब ददा लाये

खाई खजेना । तैं हाथ लेना
लइका कहाये । खेले भुलाये

ना कभू सोचे । कुछु बात खोचे
काखर भरोसा । पांचे परोसा

आये जवानी । धरके कहानी
अब काम खोजे । दिन रात रोजे

पर के सपेटा । खाये चपेटा
तैं तभे जाने । अउ बने माने

संसार होथे । दुख दरद बोथे
जब हाथ कामे । तब होय नामे

तैं बुता पाये । दुनिया बसाये
दिन रात फेरे । जांगर ल पेरे

ये पेट सेती । तैं करे खेती
प्रिवार पोसे । बिन भाग कोसे

बस बुता कामे । कर हाथ ताने
जब काम होथे । सब मया बोथे

बेरा पहागे । जांगर सिरागे
डोकरा खॉसे । छोकरा हॉसे

बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

अरे दुख-पीरा तैं मोला का डेरुहाबे

अरे दुख पीरा,
तैं  मोला का डेरूहाबे

मैं  पर्वत के पथरा जइसे,
ठाढ़े रहिहूँव ।
हाले-डोले बिना,
एक जगह माढ़े रहिहूँव

जब तैं  चारो कोती ले
बडोरा बनके आबे
अरे दुख पीरा,
तैं मोला का डेरूहाबे

मैं लोहा फौलादी
हीरा बन जाहूँ
तोर सबो ताप,
चुन्दी मा सह जाहूँ

जब तैं दहक-दहक के
आगी-अंगरा बरसाबे
अरे दुख पीरा,
तैं  मोला का डेरूहाबे

बन अगस्त के हाथ पसेरी
अपन हाथ लमाहूँ
सागर के जतका पानी
चूल्लू मा पी जाहूँ,

जब तैं इंद्र कस
पूरा-पानी तै बरसाबे
अरे दुख पीरा,
तैं  मोला का डेरूहाबे

गलती ले बड़का सजा

लगे काम के छूटना, जीयत-जागत मौत ।
गलती ले बड़का सजा, भाग करम के सौत ।।
भाग करम के सौत, उठा पटकी खेलत हे ।
काला देवय दोष, अपने अपन  झेलत हे ।।
‘रमेश‘ बर कानून, न्याय बस हवय नाम के ।
चिंता करथे कोन, कोखरो लगे काम के ।।

कवि मनोज श्रीवास्तव

घोठा के धुर्रा माटी मा, जनमे पले बढ़े हे
नवागढ़ के फुतकी, चुपरे हे नाम मा ।
हास्य व्यंग के तीर ला, आखर-आखर बांध
आघू हवे अघुवाई, संचालन काम मा ।
धीर-वीर गंभीर हो, गोठ-बात पोठ करे
रद्दा-रद्दा आँखी गाड़े, कविता के खोज मा ।
घोठा अउ नवागढ़, बड़ इतरावत हे
श्यामबिहारी के टूरा, देहाती मनोज मा ।।
-रमेश चौहान

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

बेरोजगारी (सुंदरी सवैया)

नदिया-नरवा जलधार बिना, जइसे अपने सब इज्जत खोथे ।
मनखे मन काम बिना जग मा, दिनरात मुड़ी धर के बड़ रोथे ।।
बिन काम-बुता मुरदा जइसे, दिनरात चिता बन के बरथे गा ।
मनखे मन जीयत-जागत तो, पथरा-कचरा जइसे रहिथे गा ।।

सुखयार बने लइकापन मा, पढ़ई-लिखई करके बइठे हे ।
अब जांगर पेरय ओ कइसे, मछरी जइसे बड़ तो अइठे हे ।।
जब काम -बुता कुछु पावय ना, मिन-मेख करे पढ़ई-लिखई मा
बन पावय ना बनिहार घला,  अब लोफड़ के जइसे दिखई मा ।।

पढ़ई-लिखई गढ़थे भइया, दुनिया भर मा करमी अउ ज्ञानी ।
हमरे लइका मन काबर दिखते,  तब काम-बुता बर मांगत पानी ।
चुप-चाप अभे मत देखव गा,  गुण-दोष  ल जाँचव पढ़ई लिखई के ।
लइका मन जानय काम-बुता, कुछु कांहि उपाय करौ सिखई के ।।

मुक्तक -मया

सिलाये ओठ ला कइसे खोलंव ।
सुखाये  टोटा ले कइसे बोलंव ।
धनी के सुरता के ये नदिया मा
ढरे आँखी ला तो पहिली धोलंव

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

मन के मइल (दुर्मिल सवैया)

जइसे तन धोथस तैं मल के, मन ला कब  धोथस गा तन के ।
तन मा जइसे बड़ रोग लगे, मन मा लगथे  बहुते छनके ।।
मन देखत दूसर ला जलथे, जइसे जब देह बुखार धरे ।
मन के सब लालच केंसर हो, मन ला मुरदा कस खाक करे ।।

मन के उपचार करे बर तो, दवई धर लौ निक सोच करे ।
मन के मइले तन ले बड़का, मन ला मल ले भल सोच धरे ।।
मन लालच लोभ फसे रहिथे, भइसी जइसे चिखला म धसे ।
अपने मन सुग्घर तो कर लौ, जइसे तुहरे तन जोर कसे ।।

सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

सरग-नरक

सरग-नरक हा मनोदशा हे, जे मन मा उपजे ।
बने करम हा सुख उपजाये, सरग जेन सिरजे ।।

जेन करम हा दुख उपजाथे, नरक नाम धरथे ।
करम जगत के सार कहाथे, नाश-अमर करथे ।।

बने करम तै काला कहिबे,  सोच बने धरले ।
दूसर ला कुछु दुख झन होवय, कुछुच काम करले ।।

दूसर बर गड्ढा खनबे ता, नरक म तैं गिरबे ।
अपन करम ले कभू कोखरो, छाती झन चिरबे ।।

शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

काबर डारे मोर ऊपर गलगल ले सोना पानी

काबर डारे मोर ऊपर,
गलगल ले सोना पानी

नवा जमाना के चलन
ताम-झाम ला सब भाथें
गुण-अवगुण देखय नही
रंग-रूप मा मोहाथें

मैं डालडा गरीब के संगी
गढ़थव अपन कहानी

चारदीवारी  के फइका
दिन ब दिन टूटत हे
लइका बच्चा मा भूलाये
दाई-ददा छूटत हे

मैं अढ़हा-गोढ़हा लइका
दाई के करेजाचानी

संस्कृति अउ संस्कार बर
कोनो ना कोनो प्रश्न खड़े हे
अपन गांव के चलन मिटाये बर
देशी अंग्रेज के फौज खड़े हे

मैं मंगल पाण्डेय
लक्ष्मीबाई के जुबानी

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

भेड़िया धसान

212 222 221 222 12
कोन कहिथे का कहिथे भीड़ जानय नही
बुद्धि  ला अपने ओही बेर तानय नही
भेड़िया जइसे धसथे आघू पाछू सबो
एकझन खुद ला मनखे आज मानय नही

सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

समय म निश्चित बदलाव आथे

हर चढ़ाव के बाद फिसलाव आथे
हर बहाव के बाद ठहराव आथे
बंद होय चाहे चलय ये घड़ी हा
हर समय म निश्चित बदलाव आथे

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

मुकतक (पीये बर पानी मिलत नई हे)

ऊपर वाले हा ढिलत नई हे
हमरे भाखा ओ लिलत नई हे
सेप्टिक बर आवय कहां ले
पीये बर पानी मिलत नई हे
-रमेश चौहान

मुक्तक (दूसर ला राखे बर चूरत हस)

अपने भाई ला बेघर करके
बैरी माने तैं बंदूक धरके
दूसर ला राखे बर चूरत हस
अपने भेजा मा भूसा भरके
-रमेश चौहान

बुधवार, 30 अगस्त 2017

हे गणनायक

हे गणनायक देव गजानन
(मत्तगयंद सवैया)

हे गणनायक देव गजानन
राखव राखव लाज ल मोरे ।
ये जग मा सबले पहिली प्रभु
भक्तन लेवन नाम ल तोरे ।
तोर ददा शिव शंकर आवय
आवय तोर उमा महतारी ।।
कोन इहां तुहरे गुण गावय
हे महिमा जग मा बड़ भारी ।

राखय शर्त जभे शिवशंकर
अव्वल घूमय सृष्टि ल जेने ।
देवन मा सबले पहिली अब
देवन नायक होहय तेने ।।
अव्वल फेर करे ठहरे प्रभु
सृष्टिच मान ददा महतारी ।
कोन इहां तुहरे गुण गावय
हे महिमा जग मा बड़ भारी ।।

काम बुता शुरूवात करे बर
होवय तोर गजानन पूजा ।
मेटस भक्तन के सब विध्न ल
विघ्नविनाशक हे नहि दूजा ।।
बुद्धि बने हमला प्रभु देवव
हो मनखे हन मूरख भारी ।
कोन इहां तुहरे गुण गावय
हे महिमा जग मा बड़ भारी ।

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

तीजा

 मत्तगयंद सवैया

हे चहके बहिनी चिरई कस
हॉसत गावत मानत तीजा ।
सोंध लगे मइके भुइया बड़
झोर भरे दरमी कस बीजा ।।
ये करु भात ह मीठ जनावय
डार मया परुसे जब दाई ।
लाय मयारु ददा लुगरा जब
छांटत देखत हाँसय भाई ।।

तीजा-पोरा

आवत रहिथन मइके कतको, मिलय न एक सहेली ।
तीजा-पोरा के मौका मा, आथे सब बरपेली ।।

ओही अँगना ओही चौरा, खोर-गली हे ओही ।
आय हवय सब सखी सहेली, लइकापन ला बोही ।

हमर नानपन के सुरता ला, धरे हवन हम ओली ।
तीजा-पोरा मा जुरिया के, करबो हँसी ठिठोली ।।

तरिया नरवा घाट घठौंदा, जुरमिल के हम जाबो ।
जिनगी के चिंता ला छोड़े, लइका कस सुख पाबो ।।

अपन-अपन सुख दुख ला हेरत, हरहिंछा बतियाबो ।
तीजा-पोरा संगे रहिके, अपन-अपन घर जाबो ।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

पानी पानी अब चिहरत हस, सुनय कहां भगवान

नदिया छेके नरवा छेके, छेके हस गउठान ।
पानी पानी अब चिहरत हस, सुनय कहां भगवान ।।

डहर गली अउ परिया छेके, छेके सड़क कछार ।
कुँवा बावली तरिया पाटे, पाटे नरवा पार ।।
ऊँचा-ऊँचा महल बना के, मारत हवस शान ।
पानी पानी अब चिहरत हस, सुनय कहां भगवान ।।

रूखवा काटे जंगल काटे, काटे हवस पहाड़ ।
अपन सुवारथ सब काम करे, धरती करे कबाड़ ।।
बारी-बखरी धनहा बेचे, खोले हवस दुकान ।
पानी पानी अब चिहरत हस, सुनय कहां भगवान ।।

गिट्टी पथरा अँगना रोपे, रोपे हस टाइल्स ।
धरती के पानी ला रोके, मारत हस स्टाइल्स ।।
बोर खने हस बड़का-बड़का, पाबो कहिके मान ।
पानी पानी अब चिहरत हस, सुनय कहां भगवान ।।

कइसे जी भगवान

जर भुंजा गे खेत मा, बोये हमरे धान ।
तन लेसागे हे हमर, कइसे जी भगवान ।।
तरसत हन हम बूंद बर, धरती गे हे सूख ।
बरस आय ये तीसरा, पीयासे हे रूख ।।
ठोम्हा भर पानी नही, कइसे रखब परान ।
तन लेसागे हे हमर, कइसे जी भगवान ।।
खेत-खार पटपर परे, फूटे हवय दरार ।
नदिया तरिया नल कुँवा, सुख्खा हावे झार ।।
हउला बाल्टी डेचकी, मूंदे आँखी कान ।
तन लेसागे हे हमर, कइसे जी भगवान ।।
बादर होगे दोगला, मनखे जइसे आज ।
चीं-ची चिरई मन कहय, पापी मन के राज ।।
मनखे हावय लालची, बेजाकब्जा तान ।
तन लेसागे हे हमर, कइसे जी भगवान ।।

हे जीवन दानी, दे-दे पानी

हे करिया बादर, बिसरे काबर, तै बरसे बर पानी ।
करे दुवा भेदी, घटा सफेदी, होके जीवन दानी ।।
कहूं हवय पूरा, पटके धूरा, इहां परे पटपर हे ।
तरसत हे प्राणी, मांगत पानी, कहां इहां नटवर हे ।।

हे जीवन दानी, दे-दे पानी, अब हम जीबो कइसे ।
धरती के छाती, खेती-पाती, तरसे मछरी जइसे ।।
पीये बर पानी, आँखी कानी, खोजय चारो कोती ।
बोर कुँआ तरिया, होगे परिया,  कहां बूंद भर मोती ।।

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

भारत भुईंया रोवत हे

आजादी के माला जपत
काबर उलम्बा होवत हे

एक रूख के थांघा होके,
अलग-अलग डोलत हे
एक गीत के सुर-ताल मा,
अलगे बोली बोलत हे

देश भक्ति के होली भूंज के
होरा कस खोवत हे

विरोध करे के नाम म
मूंदें हे आँखी-कान
अपने देष ला गारी देके
मारत हावय शान

राजनीति के गुस्सा ला
देशद्रोह म धोवत हे

अपन अधिकार बर घेरी-घेरी
जेन हा नगाड़ा ढोकय
कर्तव्य करे के पारी मा
डफली ला घला रोकय

आजादी के निरमल पानी मा
जहर-महुरा घोरत हे

गांव के गली परीया
कतका झन मन छेके हे
देश गांव के विकास के रद्दा
कतका झन मन रोके हे

अइसन लइका ला देख-देख
भारत भुईंया रोवत हे

शनिवार, 22 जुलाई 2017

आगे सावन आगे ।

छागे छागे बादर करिया, आगे सावन आगे ।
झिमिर-झिमिर जब बरसे बदरा, मन मोरो हरियागे ।।

हरियर हरियर डोली धनहा, हरियर हरियर परिया ।
नदिया नरवा छलकत हावे, छलकत हावे तरिया ।।

दुलहन जइसे धरती लागय, देख सरग बउरागे ।
झिमिर-झिमिर जब बरसे बदरा, मन मोरो हरियागे ।।

चिरई-चिरगुन गावय गाना, पेड़-रुख हा नाचय ।
संग मेचका झिंगुरा दुनो, वेद मंत्र ला बाचय ।।

साज मोहरी डफड़ा जइसे, गड़गड़ बिजली लागे ।
झिमिर-झिमिर जब बरसे बदरा, मन मोरो हरियागे ।।

नांगर-बइला टेक्टर मिल के, करे बियासी धनहा ।
निंदा निंदय बनिहारिन मन, बचय नही अब बन हा ।।

करे किसानी किसनहा सबो, राग-पाग ला पागे
झिमिर-झिमिर जब बरसे बदरा, मन मोरो हरियागे ।।

रविवार, 16 जुलाई 2017

ढल देश के हर ढंग मा

चल संग मा चल संग मा, ढल देश के हर ढंग मा ।
धरती जिहां जननी हवे, सुख बांटथे हर रंग मा ।।
मनका सबो गर माल के, सब एक हो धर के मया ।
मनखे सही मनखे सबो, कर लौ बने मनखे दया ।।
भटके कहां घर छोड़ के, धर बात ला तैं आन के ।
सपना गढ़े हस नाश के, बड़ शत्रु हमला मान के ।।
हम संग मा हर पाँव मा, मिल रेंगबो हर हाल मा ।
घर वापसी कर ले अभी, अब रेंग ले भल चाल मा ।।
अकड़े कहूं अब थोरको, सुन कान तैं अब खोल के ।
बचबे नहीं जग घूम के, अब शत्रु कस कुछु बोल के ।।
कुशियार कस हम फाकबो, हसिया धरे अब हाथ मा ।
कांदी लुये कस बूचबो, अउ लेसबो अब साथ मा ।।

शनिवार, 15 जुलाई 2017

बदरा, मोरे अँगना कब आबे

जोहत-जोहत रद्दा तोरे, आँखी मोरे पथरागे ।
दुनिया भर मा घूमत हस तैं, मोरे अँगना कब आबे ।

ओ अषाढ़ के जोहत-जोहत, आसो के सावन आगे ।
नदिया-तरिया सुख्खा-सुख्खा, अउ धरती घला अटागे ।

रिबी-रिबी लइका मन होवय, बोरिंग तीर मा जाके ।
घेरी- घेरी दाई उन्खर, सरकारी नल ला झाके ।

बूंद-बूंद पानी बर बदरा, बन चातक तोला ताके ।
थूकव बैरी गुस्सा अपने, अब बरसव रंग जमाके ।।

खेत-खार हा सुख्खा-सुख्खा, नांगर बइला बउरागे ।
धान-पान के बाते छोड़व, कांदी-कचरा ना जागे ।।

आन भरोसा कब तक जीबो, करजा-बोड़ी ला लाके ।
पर घर के चाउर भाजी ला, हड़िया चूल्हा हा झाके ।

चाल-ढ़ाल ला तोरे देखत, चिरई-चिरगुन तक हापे ।
गुजर-बसर अब कइसे होही, तन-मन हा मोरो कापे ।।

जीवन सब ला देथस बदरा, काल असन काबर झाके ।
थूकव बैरी गुस्सा अपने, अब बरसव रंग जमाके ।।

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

मोर सपना के भारत

मोरे सपना के भारत मा, हर हाथ म हे काम ।
जाति-धर्म के बंधन तोड़े, मनखे एक समान ।।

लूट-छूट के रीति नई हे, सब बर एके दाम ।
नेता होवय के मतदाता, होवय लक्ष्मण राम ।।

प्रांत-प्रांत के सीमा बोली, खिचय न एको डाड़ ।
नदिया जस सागर मिलय, करय न चिटुक बिगाड़ ।।

भले करय सत्ता के निंदा, छूट रहय हर हाल ।
फेर देश ला गारी देवय, निछब ओखरे खाल ।।

जेन देश के चिंता छोड़े, अपने करय विचार ।
मांगय झन अइसन मनखे, अपन मूल अधिकार ।।

न्याय तंत्र होय सरल सीधा, मेटे हर जंजाल ।
लूटय झन कोनो निर्धन के, खून पसीना माल ।।

लोकतंत्र के परिभाषा ला, सिरतुन करबो पोठ ।
वोट होय आधा ले जादा, तभे करय ओ गोठ ।।

संविधान के आत्मा जागय, रहय धर्म निरपेक्ष ।
आंगा भारू रहय न कोनो, टूटय सब सापेक्ष ।।

मौला पंड़ित मानय मत अब, नेता अउ सरकार ।
धरम-करम होवय केवल, जनता के अधिकार ।

देश प्रेम धर्म बड़े सबले, सब बर जरूरी होय ।
देश धर्म ला जे ना मानय, देश निकाला होय ।।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

मुरकेटव ओखर, टोटा ला तो धर के

थपथपावत हे, बैरी आतंकी के पीठ
मुसवा कस बइठे, बैरी कोने घर के।
बिलई बन ताकव, सबो बिला ला झाकव
मुरकेटव ओखर, टोटा ला तो धर के ।
आघू मा जेन खड़े हे, औजार धरे टोटा मा
ओ तो पोसवा कुकुर,  भुके बाचा मान के ।
धर-धर दबोचव, मरघटिया बोजव
जेन कुकर पोसे हे, ओला आघू लान के ।।

रविवार, 2 जुलाई 2017

मैं छत्तीसगढ़िया हिन्दूस्तानी अंव

मैं छत्तीसगढ़िया हिन्दूस्तानी अंव
महानदी निरमल गंगा के पानी अंव

मैं राजीम जगन्नाथ के इटिका
प्रयागराज जइसे फुरमानी अंव

मैं भोरमदेव उज्जैन खजुराहो
काशी के अवघरदानी अंव

मैं बस्तर दंतेवाड़ा दंतेश्वरी
भारत के करेजाचानी अंव

मैं भिलाई फौलादी बाजू
भारत भुईंया के जवानी अंव

मोर कका-बबा जम्मो पीढ़ी के
मैं रोवत-हँसत कहानी अंव

जात-पात प्रांतवाद ले परे
मैं भारत माता के जुबानी अंव

शनिवार, 1 जुलाई 2017

किसनहा गाँव के

नांगर बइला फांद, अर्र-तता रगियाये
जब-जब धनहा मा, किसनहा गाँव के ।
दुनिया के रचयिता, जग पालन करता
दुनिया ला सिरजाये, ब्रम्हा बिष्णु नाम के ।।
धरती दाई के कोरा, अन्न धरे बोरा-बोरा
दूनो हाथ उलचय, किसान के कोठी मा ।
तर-तर बोहावय, जब-तक ओ पसीना
तब-तक जनाही ग, स्वाद तोर रोटी मा ।।

शुक्रवार, 30 जून 2017

शौचालय बैरी हा, दुखवा बोवत हे

डोहारत-डोहारत, घर भर बर पानी
मोरे कनिहा-कुबर, दाई टूटत हवे ।
खावब-पीयब अउ, रांधब-गढ़ब संग
बाहिर-बट्टा होय ले, प्राण छूटत हवे ।।
डोकरा-डोकरी संग, लइका मन घलोक
घर म नहाबो कहि कहि पदोवत हे।
कइसे कहंव दाई, नाम सफाई के धरे
शौचालय बैरी हा, दुखवा बोवत हे ।।

गुरुवार, 29 जून 2017

देश भले बोहावय, धारे-धार बाट मा

जात-पात भाषा-बोली, अउ मजहबी गोठ
राजनीति के चारा ले, पोठ होगे देश मा ।
टोटा-टोटा बांधे पट्टा, जस कुकुर पोसवा
देश भर बगरे हे, आनी-बानी बेश मा ।
कोनो अगड़ी-पिछड़ी, कोनो हिन्दू-मुस्लिम
कोनो-कोनो दलित हे, ये बंदर बाट मा ।
सब छावत हवय, बस अपने कुरिया
देश भले बोहावय, धारे-धार बाट मा ।।

शुक्रवार, 23 जून 2017

ये सरकारी चाउर

ये सरकारी चाउर, सरकारी शौचालय
त परे-परे बनगे, कोड़िया-अलाल के ।
जेला देखव कंगला, अपने ल बतावय
गोठ उन्खर लगय, हमला कमाल के ।।
फोकट म पाय बर, ओ ठेकवा देखावय ।
कसेली के दूध घीव, हउला म डार के ।
मन भर छेके हवे, गांव के गली परिया
सड़क म बसे हवय, महल उजार के ।।

सोमवार, 19 जून 2017

सभ्य बने के चक्कर मा

लइका दाई के दूध पिये, दाई-दाई चिल्लाथे ।
आया डब्बा के दूध पिये, अपने दाई बिसराथे।।

जेने दाई अपने लइका, गोरस ला नई पियाये।
घेरी-घेरी लालत ओला, जेने ये मान गिराये ।।

सभ्य बने के चक्कर मा जे, अपन करेजा बिसराये ।
बोलव दुनिया वाले कइसे, ओही हा सम्य कहाये ।।

दाई के गोरस कस होथे, देश राज के भाखा ।
पर के भाखा ओदर जाही, जइसे के छबना पाखा ।।

म्याऊ-म्याऊ बोल-बोल के,  बिलई बनय नही तोता।
छेरी पठरू संग रही के, बघवा होय नही थोथा ।।

अपने गोरस अपने भाखा, अपने लइका ला दे दौ ।
देखा-सेखी छोड़-छाड़ के, संस्कारी बीजा बो दौ ।

मंगलवार, 13 जून 2017

पियासे ठाड़े जोहय, रद्दा एको बूंद के

करिया-करिया घटा, बड़ इतरावत
बड़ मेछरावत, करत हवे ठठ्ठा ।
लुहुर-तुहुर कर, ठगनी कस ठगत
बइठारत हवे, हमरे तो भठ्ठा ।।
नदिया-तरिया कुँआ, घर के बोर बोरिंग
पियासे ठाड़े जोहय, रद्दा एको बूंद के ।
कोन डहर बरसे, कोन डहर सोर हे
बैरी हमरे गांव ला, छोड़े हवे कूंद के ।।

रविवार, 11 जून 2017

खोज खोज के मारव

कहाँ ले पाथे आतंकी, बैरी नकसली मन
पेट भर भात अउ, हथियार हाथ मा ।
येमन तो मोहरा ये, असली बैरी होही हे
जेन ह पइसा देके, खड़े हवे साथ मा ।।
कोन धनवान अउ, कोन विदवान हवे
पोषत हे जेन बैरी, अपनेच देश के ।
खोज खोज के मारव, मुँहलुकना मन ला
येही असली बैरी हे, हमरेच देश के ।।

सोमवार, 22 मई 2017

देश-भक्ति

हमर धरम तो बस एक हे । देश-भक्ति हा बड़ नेक हे
जनम-भूमि जन्नत ले बड़े । जेखर बर बलिदानी खड़े

मरना ले जीना हे बड़े । जीये बर जीवन हे पड़े
छोड़ गोठ तैं अधिकार के । अपन करम कर तैं झार के

अपने हिस्सा के काम ला । अपने हिस्सा के दाम ला
करना हे अपने हाथ ले । भरना हे अपने हाथ ले

बइमानी भ्रष्टाचार के। झूठ-मूठ के व्यवहार के
जात-पात के सब ढाल ला । तोड़व ये अरझे जाल ला

देश बड़े हे के प्रांत हो । सोचव संगी थोकिन शांत हो
देश गढ़े बर सब हाथ दौ । आघू रेंगे बर सब साथ दौ

मनखे-मनखे एके मान के । सबला तैं अपने जान के
मया-प्रेम मा तैं बांध ले । ओखर पीरा अपने खांध ले

 देश मोर हे ये मान ले । जीवन येखर बर ठान ले
अपने माने मा तो तोर हे । नही त तोरे मन मा चोर हे

शुक्रवार, 19 मई 2017

अपने घर मा खोजत हावे, कोनो एक ठिकाना

अपने घर मा खोजत हावे, कोनो एक ठिकाना ।
छत्तीसगढ़ी भाखा रोवय, थोकिन संग थिराना ।।

सगा मनन घरोधिया होगे, घर के मन परदेशी ।
पाके आमा निमुवा होगे, निमुवा गुरतुर देशी ।।

अपने घर के नोनी-बाबू, आने भाषा बोलय ।
भूत-प्रेत के छांव लगे कस, पर के धुन मा डोलय ।।

अपन ठेकवा मा लाज लगय, पर के भाये दोना ।
दूध कसेली धरय न कोनो, करिया लागय सोना ।।

सरग म मनखे कबतक रहिही, कभू त आही नीचे ।
मनखे के जर धरती मा हे, लेही ओला खीचे ।।

मंगलवार, 16 मई 2017

आँखी म निंदिया आवत नई हे

तोर बिना रे जोही
आँखी म निंदिया आवत नई हे

ऊबुक-चुबुक मनुवा करे
सुरता के दहरा मा
आँखी-आँखी रतिहा पहागे
तोर मया के पहरा मा

चम्मा-चमेली सेज-सुपेती
मोला एको भावत नई हे
तोर बिना रे जोही
आँखी म निंदिया आवत नई हे

मोर ओठ के दमकत रंग ह
लाली ले कारी होगे
आँखी के छलकत आंसू
काजर ले भारी होगे

अइसे पीरा देस रे छलिया
छाती के पीरा जावत नई हे
तोर बिना रे जोही
आँखी म निंदिया आवत नई हे

आनी-बानी सपना के बादर
चारो कोती छाये हे
तोरे मोहनी काया के फोटू
घेरी-बेरी बनाये हे

छाती म आगी दहकत हे
बैरी पिरोहिल आवत नई हे
तोर बिना रे जोही
आँखी म निंदिया आवत नई हे

बुधवार, 3 मई 2017

जनउला-दोहा

जनउला
1.
हाड़ा गोड़ा हे नही, अँगुरी बिन हे बाँह ।
पोटारय ओ देह ला, जानव संगी काँह ।।
2.
कउवा कस करिया हवय, ढेरा आटे डोर ।
फुदक-फुदक के पीठ मा, खेलय कोरे कोर ।।
3.
पैरा पिकरी रूप के, कई कई हे रंग ।
गरमी अउ बरसात मा, रहिथे मनखे संग ।।
4.
चारा चरय न खाय कुछु, पीथे भर ओ चॅूस ।
करिया झाड़ी मा रहय, कोरी खइखा ठूॅस ।।
5.
संग म रहिथे रात दिन, जिनगी बनके तोर ।
दिखय न आँखी कोखरो, तब ले ओखर सोर ।।
6.
हाथ उठा के कान धर, लहक-लहक के बोल ।
मया खड़े परदेश मा, बोले अंतस खोल ।।
......................................................................




उत्तर
1.कुरता, 2. बेनी/चुन्दी  3.छाता  4.जुंआ  5.हवा  6.मोबाइल

सोमवार, 1 मई 2017

मोर ददा के छठ्ठी हे

मोर ददा के छठ्ठी हे,
नेवता हे झारा-झारा

कथा के साधु बनिया जइसे
मोर बबा बिसरावत गे
आजे-काले करहू कहि-कहि
ददा के छठ्ठी भूलावत गे

सपना बबा ह देखत रहिगे
टूटगे जीनगी के तारा

नवा जमाना के नवा चलन हे
बाबू मोरे मानव
मोर जीनगी ये सपना ल
अपने तुमन जानव

घेरी-घेरी सपना म आके
बबा गोठ करय पिआरा

बबा के सपना मैं ह एक दिन
ददा ले जाके कहेंव
ददा के मुह ल ताकत-ताकत
उत्तर जोहत रहेंव

सन खाये पटुवा म अभरे
चेहरा म बजगे बारा

बड़ सोच-बिचार के ददा
मुच-मुच बड़ हाँसिस
मुड़ डोलावत-डोलवत
बबा के सपना म फासिस

पुरखा के सपना पूरा करव
बेटा मोर दुलारा

छै दिन के छठ्ठी ह जब
होथे महिनो बाद
पचास बसर के लइका होके
देखंव येखर स्वाद

छठ्ठी के काय रखे हे
जब जागव भिनसारा

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

चल चिरईया नवा बसेरा

//चौपाई छंद//
चल चिरईया नवा बसेरा । अपन करम ला धरे पसेरा
पर ला अब अपने हे करना । मया प्रीत ला ओली भरना

कइसे सपना देखव आँखी । मइके मा बंधे हे पाँखी
रीत जगत के एके हावय । मइके छोड़े ससुरे भावय

मोर भाग हा ओखर हाथ म । जीना मरना जेखर साथ म
दाना-पानी संगे खाबो । अपन खोंधरा हम सिरजाबो

सास-ससुर हा देवी-देवा । मंदिर जइसे करबो सेवा
दूनों हाथ म बजही ताली । नो हय ये हा सपना खाली

धुरी सृष्टि के जेला कहिथे । जेखर बर सब जीथे मरथे
मृत्यु लोक के हम चिरईया । सुख-दुख के केवल सहईया

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

मैं भौरा होगेंव ओ.... (करमा गीत)

//करमा गीत//
नायक-
मैं भौरा होगेंव ओ....., मैं भौरा होगेंव न,
तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न
तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न ।

नायिका-
मैं चिरइया होगेंव गा...., मैं चिरइया होगेंव न,
तोर मया बदरवा, मैं चिरइया होगेंव न
तोर मया बदरवा, मैं चिरइया होगेंव न।

नायक-
फूल पतिया कस, गाल लाली-लाली...
ओठ जइसे मधुरस ले, भरे कोनो थारी
नायिका-
तोर बहिया पलना, झूलना कस लागे..
तोर मया के पुरवाही, तन-मन मा छागे

नायक-
मैं भौरा होगेंव ओ....., मैं भौरा होगेंव न,
तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न
तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न ।

नायिका-
मैं चिरइया होगेंव गा...., मैं चिरइया होगेंव न,
तोर मया बदरवा, मैं चिरइया होगेंव न
तोर मया बदरवा, मैं चिरइया होगेंव न।

नायक-
फूल कस ममहावय, मुच-मुच हाँसी ....
अरझ के रहि जाये, जीयरा करे फासी
नायिका-
तोर मया के रंग, बदरा कस लागे
देखे बर तोला रे, मन म पाखी जागे

नायक-
मैं भौरा होगेंव ओ....., मैं भौरा होगेंव न,
तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न
तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न ।

नायिका-
मैं चिरइया होगेंव गा...., मैं चिरइया होगेंव न,
तोर मया बदरवा, मैं चिरइया होगेंव न
तोर मया बदरवा, मैं चिरइया होगेंव न।

नायक-
जस चम्पा चमेली मोंगरा जुही गुलाब,
गोरी गमकत हे तोर तन के रूआब
नायिका-
आँखी के सपना मोर अंतस के आस
मन के देवता मोर मन के विश्वास

नायक-
मैं भौरा होगेंव ओ....., मैं भौरा होगेंव न,
तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न
तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न ।

जिया म जगाये अनुराग (करमा गीत)

//करमा  गीत//

नयिका-
जमुना कछार कदम डार, छेड़े मया के राग
कान्हा मुरली बजा के, -2
तन-मन मोहनी डार, जिया म जगाये अनुराग

नायक-
बाजत गैरी बोलत पैरी, मेटे हे बैराग
राधा हँस मुस्का के-2
नैना म नैना डार, जिया म जगाये अनुराग

नायक-
छलछल जमुना के पानी जइसे बानी
आँखी तोरे छलकाये
बोली तोर गुरतुर गुरतुर अमरित
नैन मया उपजाये
तैं मया के पराग, मोर बंषी के राग
जोड़े अंतस के ताग, जिया म जगाये अनुराग

नायिका-
मया के हे मूरत, कान्हा तोरे सूरत
देखते मदन मर जाये
जस कमल के पाती, पानी रहय न थाती
मोह बिन मया सिरजाये
काम रखे न पाग, प्रीत के तही सुहाग
जगा के मोरे भाग, जिया म जगाये अनुराग

नयिका-
जमुना कछार कदम डार, छेड़े मया के राग
कान्हा मुरली बजा के -2
तन-मन मोहनी डार, जिया म जगाये अनुराग

नायक-
बाजत गैरी बोलत पैरी, मेटे हे बैराग
राधा हँस मुस्का के-2
नैना म नैना डार, जिया म जगाये अनुराग

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

सहे अत्याचार (रूपमाला छंद)

शत्रु मारे देश के तैं, लांघ सीमा पार ।
हमर ताकत हवय कतका, जानगे संसार ।।

नोटबंदी झेल जनता, खड़े रहिगे संग ।
देश बर हे मया कतका, शत्रु देखे दंग ।।

हमर सैनिक हमर धरती, हमर ये पहिचान ।
मान अउ सम्मान इंखर, हमर तैं हा जान ।

झेल पथरा शत्रु के तै, सहे अत्याचार ।
हमर सैनिक मार खावय, बने तै लाचार ।।

फैसला तैं खूब लेथस, मौन काबर आज ।
सहत हस अपमान काबर, हवय तोरे राज ।।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

चना होरा कस, लइकापन लेसागे

चना होरा कस,
लइकापन लेसागे

पेट भीतर लइका के संचरे
ओखर बर कोठा खोजत हे,
पढ़ई-लिखई के चोचला धर
स्कूल-हास्टल म बोजत हे

देखा-देखी के चलन
दाई-ददा बउरागे

सुत उठ के बड़े बिहनिया
स्कूल मोटर म बइठे
बेरा बुड़ती घर पहुॅचे लइका
भूख-पियास म अइठे

अंग्रेजी चलन के दौरी म
लइका मन मिंजागे

बारो महिना चौबीस घंटा
लइका के पाछू परे हे
खाना-पीना खेल-कूद सब
अंग्रेजी पुस्तक म भरे हे

पीठ म लदका के परे
बछवा ह बइला कहागे

चिरई-चिरगुन, नदिया-नरवा
अउ गाँव के मनखे
लइका केवल फोटू म देखे
सउहे देखे न तनके

अपने गाँव के जनमे लइका
सगा-पहुना कस लागे

साहेब-सुहबा, डॉक्टर-मास्टर
हो जाही मोर लइका
जइसने बड़का नौकरी होही
तइसने रौबदारी के फइका

पुस्तक के किरा बिलबिलावत
देष-राज म समागे

बंद कमरा म बइठे-बइठे साहब
योजना अपने गढ़थे
घाम-पसीना जीयत भर न जाने
पसीना के रंग भरथे

भुईंया के चिखला जाने न जेन
सहेब बन के आगे


बुधवार, 5 अप्रैल 2017

मूरख हमला बनावत हें

बॉट-बॉट के फोकट म
मूरख हमला बनावत हे

पढ़े-लिखे नोनी-बाबू के,
गाँव-गाँव म बाढ़ हे
काम-बुता लइका मन खोजय
येखर कहां जुगाड़ हे

बेरोजगारी भत्ता बॉट-बॉट
वाहवाही तो पावत हे

गली-गली हर गाँव के
बेजाकब्जा म छेकाय हे
गली-गली के नाली हा
लद्दी म बजबजाय हे

छत्तीगढ़िया सबले बढ़िया
गाना हमला सुनावत हे

जात-पात म बाँट-बाँट के
बनवात हे सामाजिक भवन
गली-खोर उबड़-खाबड़
गाँव के पीरा काला कहन

सपना देखा-देखा के
वोट बैंक बनावत हे

मास्टर पढ़ाई के छोड़
बाकी सबो बुता करत हे
हमर लइका घात होषियार
आघूच-आघूच बढ़त हे

दिमाग देहे बर लइका मन ला
थारी भर भात खवावत हे

गाँव म डॉक्टर बिन मनखे
बीमारी मा मरत हे
कोरट के पेशी के जोहा म
हमर केस सरत हे

करमचारी के अतका कमी
अपने स्टाफ बढ़ावत हे

महिला कमाण्ड़ो घूम-घूम
दरूवहा मन ला डरूवावय
गाँव के बिगड़े शांति ल
लाठी धर के मनावय

जनता के पुलिस ला धर
वो हा दारू बेचवावत हे

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

चारो कोती ले मरना हे

झोला छाप गांव के डॉक्टर, अउ रद्दा के भठ्ठी  ।
करना हावे बंद सबो ला, कोरट दे हे पट्टी ।।

क्लिनिक सील होगे डॉक्टर के, लागे हावे तारा ।
सड़क तीर के भठ्ठी बाचे, न्याय तंत्र हे न्यारा ।।

सरदी बुखार हमला हावय , डॉक्टर एक न गाँव म ।
लू गरमी के लगे थिरा ले, तैं भठ्ठी के छाँव म।।

हमर गाँव के डॉक्टर लइका, शहर म जाके रहिथे ।
नान्हे-नान्हे लइका-बच्चा, दरूहा ददा ल सहिथे ।।

गरीबहा भगवान भरोसा, सेठ मनन सरकारी ।
चारो कोती ले मरना हे, अइसन हे बीमारी ।।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

अब आघू बढ़ही, छत्तीसगढ़ी

अब आघू बढ़ही, छत्तीसगढ़ी, अइसे तो लागत हे ।
बहुत करमचारी, अउ अधिकारी, येला तो बाखत हे ।।
फेरे अपने मन, लाठी कस तन, खिचरी ला रांधत  हे ।
आके झासा मा, ये भाषा मा, आने ला सांधत हें ।।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

मदिरा सवैया

रूप न रंग न नाम हवे कुछु, फेर बसे हर रंग म हे ।
रूप बने न कभू बिन ओखर, ओ सबके संग म हे ।।
नाम अनेक भले कहिथे जग, ईश्वर फेर अनाम हवे ।
केवल मंदिर मस्जिद मा नहि, ओ हर तो हर धाम हवे ।।

सोमवार, 20 मार्च 2017

रविवार, 5 मार्च 2017

जोगीरा सारा रारा

मउरे आमा ममहावय जब, नशा म झूमय साँझ ।
फाग गीत मा बाजा बाजे, ढोल नगाड़ा झाँझ ।।
जोगीरा सारा रारा ..
जोगीरा सारा रारा ..

सपटे सपटे नोनी देखय, मचलत हावे बाबू ।
कइसे गाल गुलाल मलवं मैं, दिल हावे बेकाबू ।
जोगीरा सारा रारा ..
जोगीरा सारा रारा ..

दाई ल बबा हा कहत हवय, डारत-डारत रंग ।
जिनगी मोर पहावत जावय, तोर मया के संग ।।
जोगीरा सारा रारा ..
जोगीरा सारा रारा ..

भइया-भौजी खेलत होरी, डारत रंग गुलाल ।
नंनद देखत सोचत हावय, कब होही जयमाल ।।
जोगीरा सारा रारा ..
जोगीरा सारा रारा ..

होली हे होली हे होली, धरव मया के रंग ।
प्रेम जवानी सब मा छाये, सबके एके ढंग ।।
जोगीरा सारा रारा ..
जोगीरा सारा रारा ..

चल न घर ग

भृंग छंद नगण (111) 6 बार अंत म पताका (21)

चल न घर ग, बिफर मत न, चढ़त हवय दारू ।
कहत कहत, थकत हवय, लगत हवय भारू ।।
लहुट-पहुट, जतर-कतर, करत हवस आज ।
सुनत-सुनत, बकर-बकर, लगत हवय लाज ।।

शनिवार, 4 मार्च 2017

भठ्ठी ल करव बंद

दारू म छठ्ठी छकत हवय गा, दारू म होय बिहाव ।
दारू म मरनी-हरनी होवय, मनखे करे हियाव ।।

दरूहा-दरूहा के रेम लगे, सजे रहय दरबार ।
दारू चुनावी दंगल गढ़थे, अउ गढ़थे सरकार ।।

गली-गली मा शोर परत हे, भठ्ठी ल करव बंद ।
पीयब छोड़ब कहय न कोनो, कहय रमेशानंद ।।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

लोकतंत्र मा छूट हवे

आजादी हे बोलब के, तभे फूटत बोल ।
सहिष्णुता के ढाल धऱे, बजावत हस ढोल ।।
देश तोरे राज तोरे, अपन अक्कल खोल ।
बैरी कोन काखर हवे, तहुँ थोकिन टटोल ।।

जतका कर सकस कर बने, सत्ता के विरोध ।
लोकतंत्र मा छूट हवे, कोनो डहर ओध ।।
दाई असन हवय धरती, देश ला मत बाँट ।
आनी-बानी बक बक के, माथा ल झन चाट ।।

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

-ददरिया-



हाथ धरे पर्स, पर्स म मोबाइल
चुपे चाप बोल ले, कर के स्माइल
मोर करेजा

मोर करेजा  उबुक-चुबुक तोला जोहे
तोला जोहे करेजा करे बर संगी
संगी मोर होइ जाबे ना

टाठ-टाठ जिंस पेंट, टाठे हे कुरता
तोर झूल-झूल रेंगना के आवत हे सुरता
मोर करेजा

मोर करेजा  उबुक-चुबुक तोला जोहे
तोला जोहे करेजा करे बर संगी
संगी मोर होइ जाबे ना
चढ़े स्कूटी, तै गली घूमे
नजर भेर देख, अपन हाथे चूमे
मोर करेजा

मोर करेजा  उबुक-चुबुक तोला जोहे
तोला जोहे करेजा करे बर संगी
संगी मोर होइ जाबे ना

कोहनी ले मेंहदी, अंगठा म छल्ला
गजब के सोहत हे, सब करे हल्ला
मोर करेजा

मोर करेजा  उबुक-चुबुक तोला जोहे
तोला जोहे करेजा करे बर संगी
संगी मोर होइ जाबे ना

एके गोड़ म पहिरे, रेशम के डोरी
सुटुर-सुटुर रेंगे, करके दिल ल चोरी
मोर करेजा

मोर करेजा  उबुक-चुबुक तोला जोहे
तोला जोहे करेजा करे बर संगी
संगी मोर होइ जाबे ना

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

कहमुकरिया


1.
अपन बाँह मा भरथंव जेला ।
जेन खुशी बड़ देथे मोला ।।
मन हरियर तन लाली भूरी ।
का सखि ?
भाटो !
नहि रे
चूरी ।।

2.
बिन ओखर जेवन नई चुरय ।
सांय-सांय घर कुरिया घुरय ।।
जेन कहाथे घर के दूल्हा ।
का सखि ?
भाटो !
नहि रे,
चूल्हा ।।

3.
दुनिया दारी जेन बताथे ।
रिगबिग ले आँखी देखाथे ।
जेखर आघू बइठवं ‘सीवी‘
का सखि ?
भाटो !
नहि रे,
टीवी ।।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

मैं तो बेटी के बाप

//नवगीत//
दुख के हाथी मुड़ मा बइठे
कइसे बिताववं रात

टुकुर-टुकुर बादर ला देखत
ढलगे हवं चुपचाप
न रोग-राई हे न प्रेम रोग हे
मैं तो बेटी के बाप

कोन सुनही काला सुनावंव
अपन मन के बात

जतका मोरे चद्दर रहिस हे
ततका पांव मारेंव
चिरई कस चुन-चुन दाना
ओखर मुह मा डारेंव

बेटी-बेटा एक मान के
पढाय लिखाय हंव घात

कइसे कहंव अपन पीरा ल
मिलय न लइका अइसे
पढ़े-लिखे गुणवान होय
मोरे नोनी हे जइसे

पढ़ई-लिखई छोड़-छोड़ के
टुरा दारू म गे मात

जांवर-जीयर बिन बिरथा हे
नोनी के बुता काम
दूनो चक्का एक होय म
चलथे गाड़ी तमाम

आंगा-भारू कइसे फांदवं
लाके कोनो बरात

टूरा अउ टूरा के ददा
थोकिन गुनव सोचव
पढ़ई लिखई पूरा करके
काम बुता सरीखव

नोनी बाबू एक बरोबर
बाढ़त रहल दिन रात


-रमेश चौहान

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

बनय जोड़ी हा कइसे

कइसे मैं हर करव, बेटी के ग बिहाव ।
बेटी जइसे छोकरा, खोजे ल कहां जांव ।
खोजे ल कहां जांव, कहूं ना बने दिखे गा ।
दिखय न हमर समाज, छोकरा पढ़े लिखे गा ।
नोनी बी. ई. पास, मिलय ना टूरा अइसे ।
टूरा बारा पास, बनय जोड़ी हा कइसे ।।

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

संगवारी

सुख दुख के तही संगवारी ।
तोर मया बर मै बलिहारी ।।
मोर संग तै देवत रहिबे ।
मोर भूल चूक सहत रहिबे ।

पाठ मितानी के धरे रहब ।
काम एक दूसर करत रहब ।।
तोर सबो पीरा मोरे हे ।
मोर सबो पीरा तोरे हे ।।

बिन तोरे ये जीनगी दुभर ।
बिन संगी हम जीबो काबर ।।
तोर मया जीनगी ल गढ़थे ।
मोला देखत तोला पढ़थे ।।

-रमेश चौहान

बुधवार, 25 जनवरी 2017

मनखे के धरम

मनमोहन छंद

मनखे के हे, एक धरम । मनखे बर सब, करय करम
मनखे के पहिचान बनय । मनखेपन बर, सबो तनय

दूसर के दुख दरद हरय । ओखर मुड़ मा, सुख ल भरय
सुख के रद्दा, अपन गढ़य । भव सागर ला पार करय

मनखे तन हे, बड़ दुरलभ । मनखे मनखे गोठ धरब
करम सार हे, नषवर जग । मनखे, मनखे ला झन ठग

जेन ह जइसन, करम करय । तइसन ओखर, भाग भरय
सुख के बीजा म सुख फरय । दुख के बीजा ह दुख भरय

मनखे तन ला राम धरय । मनखे मन बर, चरित करय
सब रिश्ता के काम करय । दूसर के सब, पीर हरय

-रमेश चौहान

बुधवार, 18 जनवरी 2017

मया

कुची हथौड़ा के किस्सा । मनखे मन के हे हिस्सा
हथौड़ा ह ताकत जोरय । कुचर-कुचर तारा टोरय  ।

अतकी जड़ कुची ह रहिथे । मया म तारा ले कहिथे
मया मोर अंतस धर ले  ।  अपने कोरा मा भर ले

जब तारा-चाबी मिलथे । मया म तारा हा खुलथे
एक ह जोड़े ला जानय । दूसर टोरे मा मानय

लहर-लहर झाड़ी डोले ।  जब आंधी हा मुँह खोले
रूखवा ठाड़े गिर परथे । अकड़न-जकड़न हा मरथे

शनिवार, 14 जनवरी 2017

राम कथा के सार

राम  कथा मनखे सुनय, धरय नहीं कुछु कान ।
करम राम कस करय नहि, मारत रहिथे शान ।।

राम भरत के सुन कथा, कोने करय बिचार ।
भाई भाई होत हे, धन दौलत बेकार ।।

दान करे हे राम हा, जीते लंका राज ।
बेजा कब्जा के इहाँ, काबर हे सम्राज ।।

गौ माता के उद्धार बर,  जनम धरे हे राम ।
चरिया परिया छेक के,  मनखे करथे नाम ।।

करम जगत मा सार हे, रामायण के काम ।
करम करत रावण बनव, चाहे बन जौ राम ।

नैतिक शिक्षा बिन पढे, सब शिक्षा बेकार ।
थोर बहुत तो मान ले, मनखे बन संसार ।।

-रमेश चौहान

बुधवार, 11 जनवरी 2017

चोरी होगे खोर गली हा

बबा पहर मा खोर गली हा, लागय कोला बारी ।
ददा पहर मा बइला गाड़ी, आवय हमर दुवारी,  ।

नवा जमाना के काम नवा, नवा नवा घर कुरिया ।
नवा-नवा फेषन के आये, जुन्ना होगे फरिया ।।

सब पैठा रेंगान टूटगे, टूटगे हे ओरवाती ।
तभो गली के काबर अब तो, छोटे लागय छाती ।।

घर ओही हे पारा ओही, खोर गली ओही हे ।
गुदा-गुदा दिखय नही अब तो, बाचे बस गोही हे ।

मोर पहर के बात अलग हे, फटफटी न आवय ।
चोरी होगे खोर गली हा, पता न कोनो पावय ।।

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

बिता भर के टुरा कहय तोर बाप के का जात हे

बिता भर के टुरा कहय
तोर बाप के का जात हे

कउवां कुकुर कस ठोकरा भुकय
देख अपन गांव के लइका ला
अपन हद म रहे रहव बाबू
झन टोरव लाज के फइका ला

ही-ही भकभक जादा झन करव
तोरे दाई-माई जात हे

गली मोहाटी बाटल-साटल
खोले काबर बइठे
दारू मंद के आगी म जरे
मरे सांप कस अइठे

सरहा कोतरी के मास
तोला कइसन भात हे

गली-गली म डिलवा ब्रेकर
तोर सेखी न रोक सकय
तोरे दीदी भाई-भोजी
तोला कोसत अपने थकय

घूम-घूम क मेछरावत गोल्लर
नागर म कहां कमात हे ।

बुधवार, 4 जनवरी 2017

मया ल ओ अनवासय

मुचुर-मुचुर जब हासय
ओ मोटीयारी
मया ल तो अनवासय


बिहनिया असन छाये
चुक लाली-लाली
सबके मन ला भाये

चिरई कस ओ चहकय
खोल अपन पांखी
मन बादर मा गमकय

फूल डोहड़ी फूले
झुमर-झुमर डारा
चारो-कोती झूले

अंतस मा मया धरे
आँखी गढियाये
बिन बोले गोठ करे